के.पी. मलिक
आज जिन मगरमच्छों को जेल की सलाखों के शिकंजे में होना चाहिए, वे आजाद घूमे और छोटी अलग-अलग नस्लों की रंग बिरंगी मछलियां सजा पाएं तो क्या यही न्याय है? जिन पर गंभीर आरोप हों, वे इस्तीफे को कवच बना लें तो क्या यही जवाबदेही है? चोर नहीं, केवल भेदिया पकड़ा जाए? क्या यही व्यवस्था है?
भक्त की आस्था पर सवाल उठें, दान पर विवाद हो, लेकिन सच्चाई अब भी परदे में रहे? क्या यही न्याय है? किसानों को सम्मान निधि और महिलाओं को उज्ज्वला पर गला फाड़ने वाले, भारत को विश्व गुरु और सनातन का रजिस्ट्रेशन नहीं बताने वाले और हर बात पर बुलडोजर चलाने वालों के मुंह में दही जम जाए? क्या यही न्याय है?
दरअसल भारत धार्मिक भावनाओं और आस्था का सम्मान करने वाला देश है और राम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इसलिए उससे जुड़ा हर विवाद केवल एक प्रशासनिक मामला नहीं रह जाता, बल्कि वह जनता के विश्वास और लोकतांत्रिक जवाबदेही की कसौटी बन जाता है। ऐसे में यदि मंदिर के चढ़ावे और वित्तीय प्रबंधन को लेकर आरोप सामने आते हैं, तो स्वाभाविक रूप से लोगों की अपेक्षा होती है कि निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच हो। यदि जांच से किसी की जिम्मेदारी सिद्ध होती है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई भी हो।
लेकिन हालिया घटनाक्रम ने जितने सवाल खड़े किए हैं, उतने जवाब नहीं दिए। सुबह सूचना पैâली कि चंपत राय ने इस्तीफा दे दिया है। राष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से में इसे तत्काल राजनीतिक उपलब्धि की तरह प्रस्तुत किया जाने लगा। ऐसा माहौल बनाया गया मानो पूरी कहानी समाप्त हो गई हो। किंतु कुछ ही घंटों बाद मंदिर प्रशासन की ओर से कहा गया कि उनकी जानकारी में ऐसा कोई इस्तीफा नहीं हुआ। एक ही दिन में दो परस्पर विरोधी दावों ने पूरे घटनाक्रम को और उलझाने वाले थे।
बड़ा सवाल यह नहीं है कि इस्तीफ़ा हुआ या नहीं हुआ। असली प्रश्न यह है कि यदि किसी मामले में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप हैं, तो क्या केवल इस्तीफे की चर्चा ही पर्याप्त है? क्या जवाबदेही का अर्थ सिर्फ पद छोड़ देना है, या फिर निष्पक्ष जांच, तथ्य सामने आना और दोष सिद्ध होने पर कानूनी कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक है?
लोकतंत्र में न्याय का सिद्धांत स्पष्ट है कि न किसी को बिना जांच के दोषी ठहराया जा सकता है और न ही केवल पद छोड़ देने से किसी भी संभावित जिम्मेदारी का प्रश्न समाप्त हो जाता है। यदि आरोप निराधार हैं, तो निष्पक्ष जांच से यह स्पष्ट होना चाहिए। और यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो फिर कार्रवाई व्यक्ति के पद, प्रभाव या राजनीतिक संबंध देखकर नहीं, बल्कि कानून के आधार पर होनी चाहिए।
यही कारण है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति या एक संस्था का नहीं रह गया है। यह उस भरोसे का प्रश्न है, जो करोड़ों लोगों ने अपनी आस्था के साथ जोड़ा है। जनता यह जानना चाहती है कि दान का पैसा कहां गया, उसका हिसाब क्या है, और यदि कहीं कोई गड़बड़ी हुई है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा यही होती है कि क्या कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है। यदि छोटे कर्मचारी ही जवाबदेही का चेहरा बन जाएं और बड़े पदों पर बैठे लोगों तक जांच कभी न पहुंचे, तो जनता के मन में यह धारणा बनती है कि व्यवस्था कमजोर पर कठोर और शक्तिशाली पर उदार है।
इस पूरे विवाद का निष्कर्ष एक ही है-देश को न तो अफवाहों की राजनीति चाहिए, न श्रेय लेने की जल्दबाजी और न ही प्रतीकात्मक कदमों का शोर। देश को चाहिए तथ्य, पारदर्शिता और निष्पक्ष न्याय। क्योंकि आस्था तभी सुरक्षित रहती है जब उसके साथ जवाबदेही भी उतनी ही मजबूत हो। आखिरकार सवाल आज भी वहीं खड़ा है कि क्या न्याय केवल इस्तीफे का नाम है, या फिर सच्चाई सामने लाकर कानून के अनुसार निष्पक्ष कार्रवाई करना ही वास्तविक न्याय कहलाता है?
(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं)
