मुख्यपृष्ठस्तंभ४० साल से पुनर्वास की प्रतीक्षा!

४० साल से पुनर्वास की प्रतीक्षा!

-विकास की कीमत कौन चुकाएगा?

-जंगल और मैंग्रोव पर मेट्रो का दबाव

महानगर क्षेत्र में विकास परियोजनाओं की रफ्तार तेज है, लेकिन इनके कारण विस्थापित लोगों और पर्यावरण की कीमत कौन चुकाएगा, इसका संतोषजनक उत्तर अब भी नहीं है। उरण के हनुमान नगर कोलीवाड़ा में २५६ परिवार ४० वर्षों से अधिक समय से ट्रांजिट वैंâप में रह रहे हैं। वहीं, ठाणे की प्रस्तावित रिंग मेट्रो परियोजना से हजारों मैंग्रोव और पेड़ों पर संकट की आशंका सामने आई है।
न्हावा शेवा बंदरगाह परियोजना के लिए वर्ष १९८० के दशक में विस्थापित किए गए परिवारों का आरोप है कि उन्हें पखवाड़े में केवल एक बार पीने का पानी मिलता है। सार्वजनिक शौचालय जर्जर हैं। उनमें पानी और बिजली की सुविधा नहीं है तथा रात में वहां तक जाने के लिए स्ट्रीट लाइट भी उपलब्ध नहीं है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी से बुनियादी सुविधाओं और पुनर्वास की दिशा में उठाए गए कदमों का हलफनामा मांगा है। पुनर्वास के लिए उरण के दो गांवों में १०.१६ हेक्टेयर जमीन चिह्नित होने के बावजूद मामला सरकारी प्रक्रियाओं में अटका हुआ है। दूसरी ओर, १२,२०० करोड़ रुपए की ठाणे इंटीग्रल रिंग मेट्रो परियोजना लगभग २७ किलोमीटर लंबी होगी और इसमें २२ स्टेशन प्रस्तावित हैं। परियोजना संबंधी दस्तावेजों के अनुसार, इसके निर्माण से ५,३८० मैंग्रोव और ३,००० से अधिक पेड़ प्रभावित हो सकते हैं। इसका कुछ हिस्सा संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान तथा उसके अधिसूचित पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र से भी गुजरेगा। अभी मैंग्रोव के बदले किए जाने वाले प्रतिपूरक वृक्षारोपण की स्पष्ट योजना सामने नहीं आई है।
भरपाई तय किए बिना आगे बढ़ाई जा रही है परियोजना
एक परियोजना के लिए जमीन देने वाले लोग चार दशक बाद भी सम्मानजनक आवास और पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं, जबकि नई परियोजना को पर्यावरणीय क्षति की पूरी भरपाई तय किए बिना आगे बढ़ाया जा रहा है। विकास केवल बंदरगाह, मेट्रो और कंक्रीट के ढांचों का नाम नहीं हो सकता। प्रभावित परिवारों का समयबद्ध पुनर्वास, स्वतंत्र पर्यावरणीय आकलन, सार्वजनिक सुनवाई और नुकसान की पूर्व भरपाई किसी भी परियोजना की अनिवार्य शर्त होनी चाहिए। अन्यथा विकास का लाभ शहर को मिलेगा और उसकी वास्तविक कीमत गरीब परिवार, मछुआरे, जंगल तथा तटीय पारिस्थितिकी को चुकानी पड़ेगी।

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