राजन पारकर
देश और समाज की तस्वीर कभी-कभी ऐसी बन जाती है कि एक ओर शिक्षा व्यवस्था खुद परीक्षा में खड़ी दिखाई देती है, दूसरी ओर चमकती दुनिया के पीछे छिपे अंधेरे कारोबार सामने आते हैं और तीसरी ओर नागरिक अपनी ही पहचान के कागज तलाशता नजर आता है। सवाल सिर्फ जवाबों का नहीं, पूरी व्यवस्था की कॉपी जांचने का है।
गुरु बनने की परीक्षा ही सवालों के घेरे में
टीईटी परीक्षा का पेपर लीक हुआ तो सरकार ने कहा कि अब परीक्षा ऑनलाइन होगी। यानी जिस तंत्र से कागज की सुरक्षा नहीं संभली, वह अब डिजिटल ताले लगाने की तैयारी कर रहा है।
परीक्षा देने वाला विद्यार्थी वर्षों मेहनत करता है, लेकिन कुछ लोग मेहनत की जगह ‘मैनेजमेंट’ का रास्ता तलाश लेते हैं। यहां सवाल सिर्फ पेपर लीक का नहीं, उस सोच का है, जहां ईमानदार मेहनत कतार में खड़ी रहती है और शॉर्टकट वीआईपी गेट से भीतर पहुंच जाता है। आचार्य अत्रे शायद लिखते-‘जिस व्यवस्था में प्रश्नपत्र बाजार में और उत्तर जांच केंद्र में मिलें, वहां असली परीक्षा विद्यार्थियों की नहीं, प्रशासन की होती है।’
चेहरों के साथ चरित्र भी सवालों में!
मुंबई में कथित देह-व्यापार रैकेट का पर्दाफाश हुआ और पुलिस कार्रवाई में कई महिलाओं को मुक्त कराया गया। यह सिर्फ अपराध की खबर नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है, जहां चमक-दमक के पीछे मजबूरी, शोषण और लालच की कहानियां छिपी रहती हैं। जब कला और ग्लैमर की दुनिया के नाम पर दलालों का खेल चलता है, तो सवाल सिर्फ कानून का नहीं, उस मानसिकता का भी है, जो इंसान को इंसान नहीं, बल्कि वस्तु समझने लगती है। ‘समाज ने चेहरे सजाने के लिए बहुत आईने खरीदे, मगर चरित्र देखने के लिए आईना लगाना भूल गया।’
नागरिक कौन? कागजों की अदालत में पहचान का मुकदमा!
पासपोर्ट और नागरिकता के प्रमाण को लेकर चल रही बहस ने आम नागरिक के सामने फिर वही पुराना सवाल खड़ा कर दिया है— आखिर भारतीय होने की अंतिम पहचान किस दस्तावेज से तय होगी? आज इंसान के पास मोबाइल है, बैंक खाता है, आधार है, पैन है और सरकारी रिकॉर्ड की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन जब पहचान साबित करने की बारी आती है, तो फाइलों का पहाड़ सामने खड़ा हो जाता है। ‘देश का नागरिक बनने के लिए अब सिर्फ जन्म काफी नहीं लगता, कागजों की परीक्षा भी पास करनी पड़ती है।’ एक खबर व्यवस्था की कमजोरी दिखाती है, दूसरी समाज का अंधेरा और तीसरी पहचान की उलझन। सवाल यह नहीं कि खबरें कितनी बड़ी हैं, सवाल यह है कि हम कब तक इन्हें सिर्फ खबर मानकर आगे बढ़ते रहेंगे? लोकतंत्र सिर्फ चुनावों से नहीं, व्यवस्था पर जनता के भरोसे से चलता है। जब परीक्षा पर भरोसा डगमगाए, समाज का चरित्र कटघरे में खड़ा हो और नागरिक अपनी ही पहचान साबित करने में उलझ जाए, तब यह सिर्फ घटनाओं का सिलसिला नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था के आत्ममंथन का समय बन जाता है।
