मुख्यपृष्ठस्तंभउड़ता तीर : निर्णायक रहेगी आधी आबादी की भूमिका

उड़ता तीर : निर्णायक रहेगी आधी आबादी की भूमिका

डॉ. रमेश ठाकुर
नई दिल्ली

बीते कुछ दशकों से बिहार की आधी आबादी पुरुष मतदाताओं के मुकाबले सर्वाधिक मतदान कर रही है। अपने बूते जिसे चाहे उसे सत्ता सौंपने का माद्दा रखती है। हालिया, चुनावी सर्वेक्षण रिपोर्ट्स कुछ ऐसे ही संकेत इस बार भी दिखा रही हैं। सर्वे बताते हैं कि बिहार चुनाव में महिलाएं लैंगिक सियासत की बदलती गतिशीलता की नई तस्वीर पेश करेंगी। हिंदी पट्टी वाले राज्यों में चुनावी समर में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं, जिनमें बिहार सबसे अव्वल है। चुनाव चाहे सांसदी के हों या विधानसभा के या फिर पंचायत के सभी में महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत सर्वाधिक रहा है। पूर्व के इन जारी आंकड़ों को देखते हुए बिहार चुनाव में तकरीबन सभी सियासी दल महिला वोटरों पर ही ज्यादा दांव लगा रहे हैं।
इतना तय है कि महिलाएं इस बार चुनावी गच्चा खाने के मूड में हैं नहीं? झूठे वादों में नहीं फंसेंगी। पिछले चुनाव में एनडीए के खाते में ४० फीसदी वोट पड़ने वाला समूह शांत दिखाई पड़ता है। बिहार के चुनावी उत्सव में चाहे महिला वोटर हों या विधायक? एकाध दशकों में इनकी भागेदारी सरकारों में भी रही है। विधानसभा-२०२० में महिला उम्मीदवारों ने रामनगर, धमदाहा, प्राणपुर, कोढ़ा, गौराबौराम, गोपालगंज, राजापाकर, महनार, कटोरिया, मोकामा, मसौढ़ी, संदेश, नोखा, नरकटियागंज, बेतिया, केसरिया, परिहार, बाबूबरही, फुलपरास, त्रिवेणीगंज, शेरघाटी, बाराट्टी, हिसुआ, बारसलीगंज और जमुई में विजयी पताका लहराया था।
महिलाओं के लिए मौजूदा विधानसभा-२०२५ चुनाव यह निर्धारित करेगा कि जनकल्याण के माध्यम से सशक्तीकरण वास्तव में स्वायत्ता में तब्दील होता है या सिर्फ चुनावी सुविधा बनकर ही रह जाएगा। पिछले आंकड़ों को देखा जाए तो भाजपा का पूरा फोकस महिलाओं पर है। तभी तो उन्होंने चुनाव तारीखों की घोषणा से पूर्व ही ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार’ स्कीम के तहत लगभग ७५ लाख महिलाओं के बैंक खातों में दस-दस हजार रुपए की नकद धनराशि पहले ही भेज दी है। पैसा पाकर महिलाएं खुश जरूर हैं, लेकिन इस बात की गारंटी नहीं दी कि वे ‘नोट के बदले वोट’ देंगी या नहीं? इस स्कीम पर महिलाओं को संशय इसलिए है कि ये घोषणा नीतीश कुमार ने नहीं, बल्कि दिल्ली से प्रधानमंत्री द्वारा हुई। क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी एक घोषणा उन्हीं के द्वारा की गई थी, जो अभी तक लागू नहीं हुई है। इन सभी तथ्यों की समीक्षाएं महिलाएं इस बार कर रही हैं। महिला वोटरों को रिझाने में कोई भी सियासी दल पीछे नहीं है? सभी अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार वादा कर रहे हैं? जबकि, बिहार में दूसरे सबसे मजबूत दल आरजेडी ने तो प्रत्येक परिवार के एक-एक सदस्य को नौकरी देने की भी घोषणा की है। कुल मिलाकर, बिहार का मौजूदा चुनावी गणित आधी आबादी के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है। चुनाव आयोग के मुताबिक बिहार में १०० में ४८ फीसदी वोटर आंकड़ा महिलाओं का है। पिछले चुनाव में रिकॉर्ड ४० फीसदी मतदान महिलाओं ने एनडीए के पक्ष में किया था। इतनी वोटिंग इस बार भी जिस दल के पक्ष में होगी, वही बाजी मारेगा। हालांकि, पिछले विधानसभा-२०२० के चुनाव में जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी का एलान किया था तो उस एलान को महिलाओं ने हाथों-हाथ लिया था। वोटरों के अलावा उम्मीदवार के तौर पर भी दर्जनों महिलाएं इस बार भी मैदान में हैं। ११ विधानसभाओं में १० पुरुष वोटरों की तुलना में ९ महिला मतदाता हैं। ११ विधानसभा क्षेत्रों से ही लिंगानुपात ठीक होने पर महिला विधायक निर्वाचित हुई, जिनमें त्रिवेणीगंज, धमदाहा, कोढ़ा, राजापाकर, कटोरिया, संदेश, शेरघाटी, बाराचट्टी, हिसुआ, वारसलिगंज और जमुई विधानसभा शामिल हैं। विधानसभा चुनाव-२०२० में एनडीए के लिए शराबबंदी का वादा तुरुप का पत्ता साबित हुआ था। महिलाओं ने खुलकर जेडीयू का समर्थन किया था। हालांकि, वह वादा धरातल पर उतना कारगर साबित नहीं हुआ, जितने की उम्मीद महिलाएं लगाकर बैठी थीं। महिलाएं निर्णायक भूमिका में होंगी, यह बात नीतीश से लेकर प्रधानमंत्री और तेजस्वी यादव भी जानते हैं। गुजरे २० वर्षों से कुर्सी पर बैठे नीतीश को बदलकर नया चेहरा लाने को भी महिलाएं आतुर दिखती हैं। नीतीश के पीछे कई सत्ता विरोधी मुद्दे भी हावी हैं। वहीं महाराष्ट्र की तरह इस चुनाव से भाजपा अपना स्वयं का प्रभुत्व स्थापित करना चाहती है। इस दिशा में उन्होंने जेडीयू और अपने लिए बराबर-बराबर सीट बांटकर पहला कदम बढ़ा भी दिया है। इसलिए यह चुनाव नीतीश के २० वर्ष का सुशासन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय प्रदाता छवि से अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिस्पर्धा भी कह सकते हैं। पिछले विधानसभा में भाजपा ने ७४ सीटें जीती थीं, जबकि जेडीयू मात्र ४३ पर सिमट गई थी, बावजूद इसके अनुकूल परिस्थितियों को भांपकर भाजपा ने दूसरे नंबर पर रहने का समझौता किया था। लेकिन इस बार की स्थिति पहले से जुदा है। दोनों दल १०१-१०१ सीटों पर लड़ रहे हैं। चुनाव परिणाम में अगर भाजपा की एक भी सीट इस बार ज्यादा आई, तो उनका मुख्यमंत्री किसी भी सूरत में बनेगा। अगर ऐसा हुआ, तो नीतीश फिर से पलटने में देर नहीं करेंगे।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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