कविता श्रीवास्तव
हाथ में वैंâची, आंखों पर चश्मा और गले में लटकता कपड़ा नापने का मेजर टेप, अधिकतर टेलरों की पहचान यही होती है। वे हमेशा मेज पर रखे कपड़े नापकर काटते दिखते हैं। ग्राहकों से मुस्कराहट के साथ पेश आनेवाले ये टेलर अक्सर समय पर कपड़े सिलकर नहीं दे पाते हैं। तब बड़ी खीझ होती है क्योंकि कपड़े ज्यादातर किसी फंक्शन या खास मौके पर पहनने के लिए बनवाए जाते हैं। मौके पर नया कपड़ा नहीं पहन पाए तो उसे सिलवाने का मकसद ही व्यर्थ हो जाता है। अधिकतर पुरुष आजकल रेडीमेड कपड़े पहनते हैं, लेकिन महिलाओं को आज भी उनकी पसंद के अनुसार ब्लाउज, लहंगा व अन्य वस्त्र बनवाने पड़ते हैं। समय पर कपड़े न मिलने से महिलाओं को अक्सर टेलर से विनती करते देखा जाता है। टेलर का काम पूरी तरह हाथ से होता है और उसमें कारीगरी का महत्व है इसीलिए टेलर जल्दबाजी नहीं करते हैं। परफेक्शन और प्रोफेशनल व्यवहार ही उनके व्यापार का आधार है। पैâशन बुटीक इसीलिए खूब चलते हैं। लेकिन ब्लाउज समय पर न सिलने पर दर्जी पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। ऐसा एक मामला अमदाबाद में हुआ। एक महिला को समय पर ब्लाउज सिलकर न देने पर टेलर को सात हजार रुपए का जुर्माना भरना पड़ा। महिला ने टेलर को एडवांस पैसे दिए थे और कलात्मक साड़ी का टुकड़ा ब्लाउज सिलने के लिए दिया था। टेलर ने वादा करने के बाद भी समय पर ब्लाउज नहीं दिया। महिला को खास दिन दूसरे वस्त्र पहनने पड़े। उसे मानसिक पीड़ा पहुंची। इसीलिए जुर्माने में मूल राशि की वापसी और मानसिक कष्ट के लिए अतिरिक्त मुआवजा शामिल था। इसी तरह महाराष्ट्र के धाराशिव में भी ब्लाउज के मामले में ही उपभोक्ता आयोग ने एक बुटीक पर ग्राहक की मानसिक परेशानी और वित्तीय नुकसान के लिए जुर्माना लगाया। इसमें सीखने की बात यह है कि ग्राहक यदि सजग रहे तो उसे परेशानी से राहत दिलाने की कानूनी व्यवस्था है। सेवा में कमी और ग्राहक को हुई मानसिक परेशानी के लिए किसी भी विक्रेता या सेवा प्रदाता पर जुर्माना लगाया जा सकता है। ग्राहक की शिकायत पर मूल राशि की वापसी, ब्याज और हर्जाना भी मिल सकता है। सरकार ने ‘जागो ग्राहक जागो’ उपभोक्ता जागरूकता अभियान भी इसीलिए चला रखा है। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित करना और व्यापारियों की गलतियों व ठगी से बचाना है। खरीदारी करते समय गुणवत्ता की जांच करने, बिल लेने और यदि कोई समस्या हो तो शिकायत दर्ज करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इसके लिए हेल्पलाइन नंबर, व्हॉट्सऐप, ईमेल और ऐप के माध्यम उपलब्ध हैं। उपभोक्ता विवाद निवारण हेतु सरकारी कमेटी, आयोग और अदालत भी है। इसका सभी उपभोक्ताओं को पता होना चाहिए। विक्रेता और सेवा प्रदाता भी सजग रहें, नहीं तो गलती पर बेचारे दर्जी बाबू की तरह जुर्माना भरना पड़ेगा।
