मुख्यपृष्ठग्लैमर‘गुजारिश’, जब भंसाली ने जिंदगी, दर्द और सम्मान को नई रोशनी में...

‘गुजारिश’, जब भंसाली ने जिंदगी, दर्द और सम्मान को नई रोशनी में परखा

हिमांशु राज

साल 2010 में जब संजय लीला भंसाली की ‘गुज़ारिश’ रिलीज हुई, तब बॉलीवुड मुख्यधारा में इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील विषयों को छूने से हिचकता था। लेकिन भंसाली ने हिम्मत दिखाते हुए एक ऐसे जादूगर ईथन मस्करेनहास (ऋतिक रोशन) की कहानी सामने रखी, जो दुर्घटना के बाद पूरी तरह अपंग हो चुका है और सम्मान के साथ मरने के अधिकार की गुहार अदालत में लगाता है। यह कहानी किसी पलायन की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, दर्द और जीवन के अर्थ की गहराई को टटोलने की है।उस दौर में भारत में इच्छामृत्यु पर बात करना लगभग असंभव था, लेकिन ‘गुज़ारिश’ ने इस संवाद की शुरुआत कर दी। फिल्म ने सवाल उठाया कि जब जीवन असहनीय हो जाए, क्या इंसान को उसे समाप्त करने का अधिकार होना चाहिए? ईथन के ज़रिए भंसाली ने दिखाया कि दर्द केवल शारीरिक नहीं होता; वह सम्मान, आजादी और चुनाव के अधिकार से भी जुड़ा होता है। ऋतिक रोशन का अभिनय फिल्म की आत्मा है-संवेदनशील, शांत और गहराई से भरा हुआ। उन्होंने अपने किरदार में नर्म भावनाओं और दमित पीड़ा का सुंदर संगम दिखाया। ऐश्वर्या राय बच्चन, नर्स सोफिया के रूप में, करुणा और वफ़ादारी की मिसाल देती हैं। दोनों कलाकारों की केमिस्ट्री फिल्म को संवेदना की नई ऊंचाई पर ले जाती है, जबकि भंसाली का निर्देशन इसे कलात्मक गहराई देता है।हर दृश्य मानो एक पेंटिंग की तरह है-संगीत, कैमरा और संवाद सब मिलकर दर्शक को भीतर तक छूते हैं। आज, पंद्रह साल बाद, जब भारत में सम्मानपूर्वक मृत्यु का अधिकार मान्यता पा चुका है, ‘गुजारिश’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि सिनेमा की वह दास्तान बन चुकी है, जिसने समाज को सोचने पर मजबूर किया। यह भंसाली की वह कृति है, जिसने सिनेमा से आगे बढ़कर इंसानियत की आवाज़ बनना सीखा।

अन्य समाचार

कजरी