राजन पारकर / मुंबई
मालेगांव में एक बच्ची के साथ अमानवीय हरकत ने पूरे शहर को आक्रोशित कर दिया। जनता न सिर्फ सड़क पर उतर गई बल्कि अदालत तक पहुंच गई। अदालत का गेट भी शायद पहली बार इतना घबराया होगा। लोग अंदर आने के लिए टूट पड़े और बेचारे गेट ने सोचा, ‘मैं तो जीवनभर न्यायालय की मर्यादा की रखवाली करता रहा। आज मेरे ही सिर पर न्याय का हथौड़ा गिरा!’
गेट टूटा, मगर जनता का गुस्सा नहीं। और इस आग में हमारी ‘संवेदनशील’ कानून-व्यवस्था बेबस दिख रही थी। मानो कह रही हो, ‘हम कागजों में मौजूद हैं। जमीन पर नहीं!’ इस घटना में फडणवीस की ‘संवेदनशील’ छवि की संवेदना गई, छवि रह गई। मालेगांव में भीड़ द्वारा अदालत का गेट तोड़कर अंदर घुसने का नजारा देखकर समझ आया, संवेदनशीलता सिर्फ भाषणों में थी, जमीन पर स्थिति पत्थर की तरह सख्त थी। पुलिस लाठी चला रही थी और हवा चीरती लाठियां जैसे कह रही थीं, ‘हमारी मौजूदगी है, पर कानून कहां है मत पूछिए।’ फडणवीस कहते हैं, ‘हमें अनुभव है।’ सही कहा, क्योंकि उनके कार्यकाल में जनता को कानून-व्यवस्था की नाकामी का अनुभव रोज मिलता है। मालेगांव का मंजर ऐसा है मानो जनता ज्वालामुखी और प्रशासन बर्फ का गोला है। अपराधी को कोर्ट में लाने की खबर मिलते ही भीड़ ज्वालामुखी की तरह फट पड़ी। ऐसे में कोर्ट परिसर ने खुद से पूछा, ‘ये न्याय लेने आए हैं या न्याय व्यवस्था की नींव हिलाने?’ और पुलिस बंदोबस्त बुदबुदाया, ‘हम तैनात तो हैं सक्षम नहीं!’
राज्य की कानून-व्यवस्था ऐसी हो गई है, जैसे कोई जर्जर बस, जिसे अनुभवी ड्राइवर चलाए तो सही, पर बस खुद ही रास्ते में दम तोड़ दे। फडणवीस कहते हैं, ‘हम संवेदनशील हैं।’ अवश्य हैं। क्योंकि जनता का दर्द, आक्रोश, चीखें, सब कुछ संवेदनाओं को ही तो छूते हैं। पर सरकार की संवेदनाएं कहां घूम रही हैं। ये कोई नहीं बताता!
मालेगांव की घटना एक तरह से ‘कानून-व्यवस्था की चिता पर अंतिम कील’ साबित हो गई। जनता सड़क पर उतर आई, कोर्ट का गेट तोड़ा गया, पुलिस लाठियां चलाती रही। और सरकार? वह शायद अब भी ‘गहरी संवेदना व्यक्त’ करने वाली प्रेस नोट का मसौदा तैयार कर रही होगी!
