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संपादकीय : मिंधे की ‘मैदान’ चोरी सांड़ हुआ बेकाबू!

महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार का सांड़ खुलकर उधम मचा रहा है। यह सांड़ पूरी तरह बेकाबू हो चुका है। खरात बाबा महिलाओं का शोषण करते रहे, जबकि गृहमंत्री लंबे समय तक निष्क्रिय बने रहे। अब भ्रष्टाचार के इस सांड़ को काबू करना तो दूर मुख्यमंत्री उसे और बढ़ावा देते हुए नजर आ रहे हैं। इस सांड़ की भूख कितनी बढ़ गई है? इसकी भूख तो बकासुर से भी ज्यादा लगती है। अगर ऐसा नहीं होता तो मुंबई-महाराष्ट्र के खेल के मैदानों को निगलने की योजना नहीं बनाई होती। मिंधे के अधीन नगर विकास विभाग ने एक ऐसी नीति बनाई है, जिसके अनुसार खेल के मैदानों पर होटल और मॉल्स बनाए जाएंगे। महाराष्ट्र की सार्वजनिक और खेल संस्कृति को शर्मसार करनेवाला यह व्यापारिक उद्योग क्या मुख्यमंत्री फडणवीस को मंजूर है? मुंबई और महाराष्ट्र में पहले ही खेल के मैदान नहीं बचे हैं। मैदानों पर या तो बिल्डरों का या फिर झोपड़पट्टी दादाओं का अतिक्रमण हो गया है। शहर के बच्चों को सड़कों पर खेलना पड़ता है। कभी-कभी पार्विंâग में खेल जमाना पड़ता है। खेल के मैदानों को बचाने के लिए कई खेल संगठन आंदोलन कर रहे हैं। ऐसे समय में नगर विकास विभाग ने UDCPR में बदलाव करके ‘इंटीग्रेटेड स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स’ के नाम पर खेल के मैदानों को हड़पने का उद्योग शुरू किया है। मुंबई मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में पांच हेक्टेयर और शेष राज्य में १० हेक्टेयर से अधिक की खुली जगहों पर पंचतारांकित होटल, मॉल आदि बनाने की अनुमति देना एक गंभीर मसला है। इसके अनुसार खेल के मैदान की ७० प्रतिशत खुली जगह खेल के लिए और ३० प्रतिशत व्यावसायिक उपयोग के लिए होगी। इसका अर्थ है कि ३० प्रतिशत व्यावसायिक उपयोग में मिंधे के ही
बिल्डर और ठेकेदार
आएंगे और भ्रष्टाचार का १०० प्रतिशत माल मिंधे की जेब में जाएगा। बच्चों, छात्रों और खिलाड़ियों के कौशल की बलि देकर खेल के नाम पर भ्रष्टाचार का यह नया फॉर्मूला है। नाम स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का है, लेकिन ‘खेल’ करने वाले बिल्डर कल बची हुई ७० प्रतिशत जमीन पर भी कब्जा कर लेंगे। सरकार कहती है, ‘राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं आयोजित करनी हैं तो आधुनिक स्पोर्ट्स इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना होगा।’ सरकार की नीति सही है, लेकिन खेल और नगर विकास विभाग का संबंध क्या है? मिंधे को अचानक खेल के उद्धार का विचार वैâसे आया? यह एक रहस्य ही है। खैर, आपकी खेल संबंधी सटीक नीति क्या है? यदि ऐसी कोई खेल नीति है भी, तो उस नीति में खेल के मैदानों पर मॉल्स और होटलों का उद्योग क्यों? ये प्रश्न जनता के मन में हैं और इनका उत्तर मुख्यमंत्री फडणवीस को ही देना होगा। मिंधे की खेल नीति दरअसल ‘बिल्डर खेल नीति’ है और भ्रष्टाचार का सबसे निचला स्तर है। अब मिंधे ने जो खेल के मैदान निगलने की नीति बनाई है, उसमें जगहों का चयन कैसे किया जाएगा? उसके लिए किन बिल्डरों को अनुमति मिलेगी? मुख्य बात यह है कि ३० प्रतिशत व्यावसायिक क्षेत्र किस कीमत पर बेचा जाएगा और वह पैसा निश्चित रूप से किसकी जेब में जाएगा? ये सवाल आज ही पूछे जाने चाहिए। मुंबई के प्रमुख खेल मैदानों की बात करें तो सबसे पहले शिवाजी पार्क, आजाद मैदान, कूपरेज, मरीन लाइंस के स्पोर्ट्स जिमखाना, कई स्कूल-कॉलेजों के मैदानों पर भी यदि मिंधे की
नई डकैती का हमला
होनवाला है तो मुंबई की इंच-इंच जमीन के लिए खिलाड़ियों, छात्रों और जनता को सड़कों पर उतरना होगा। ठाणे का गावदेवी मैदान, सेंट्रल मैदान, दादोजी कोंडदेव मैदान आदि जगहों को भी मिंधे ३० प्रतिशत के हिसाब से बिल्डरों को दे देंगे, ऐसा ही अब दिख रहा है। इसी क्रम में वानखेड़े मैदान, ब्रेबोर्न मैदान भी बिल्डरों को देने में मिंधे को संकोच नहीं होगा। पैसे खाने के लिए पायजामे का नाड़ा एक बार छोड़ दिया तो फिर शर्म कैसी? मैदान की जगह पर होटल खड़े करना बच्चों के भविष्य के साथ खेलने जैसा है। अगली पीढ़ी को मैदान केवल फोटो में ही देखना पड़ेगा। यदि आज खेल के मैदान चले गए, तो कल मुंबई-महाराष्ट्र के सभी खेलों पर पूर्णविराम लग जाएगा। मुंबई के बिल्डरों ने पहले ही मैदानों पर आक्रमण कर दिया है। सरकार और बिल्डरों के बीच माफिया स्टाइल में मिलीभगत हो गई है। मुंबई में मनोरंजन के लिए रखी गई जगहों और खेल के लिए आरक्षित भूखंडों को बिल्डरों ने निगल लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार चेतावनी दी है कि मनोरंजन और खेल के मैदानों के लिए रखी गई जगहों का स्वरूप बदला नहीं जा सकता, लेकिन मिंधे ने नियम बदलकर पिछले दरवाजे से लेन-देन किया है। खुली जगहों का इस प्रकार व्यावसायीकरण एक बड़ा खतरा है। मैदानों को निगलकर वहां अति-अमीरों के लिए ‘एलीट क्लब हाउसेस’ खड़े होंगे और उसमें भी मिंधे की हिस्सेदारी सौ प्रतिशत होगी। गौतम अडानी के आक्रमण जितना ही मिंधे का यह आक्रमण खतरनाक है। मुंबई और खेल के मैदानों को बचाना ही होगा। देवेंद्र फडणवीस, आपकी क्या राय है?

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