मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत : पायलट के मौन से उठते सवाल!

रुख-ए-सियासत : पायलट के मौन से उठते सवाल!

तौसीफ कुरैशी

राजस्थान की राजनीति में एक वाक्य पूरा परिदृश्य खोल देता है। भाजपा नेता राधामोहन अग्रवाल का यह कहना कि सचिन पायलट की ‘एक टांग कांग्रेस में है और दूसरी टांग कहीं और। सुनने में भले ही भाजपा की रोजमर्रा की बयानबाजी लगे, मगर इस बार जो हुआ, वह असामान्य था। कांग्रेस के भीतर जैसे कोई अदृश्य तार छू गया हो। देखते ही देखते अशोक गहलोत, गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली सभी एक स्वर में पायलट के बचाव में उतर आए। यह बचाव जितना तेज था, उतना ही अर्थपूर्ण भी। क्योंकि राजनीति में बचाव अक्सर आरोप से बड़ा संकेत होता है। गहलोत ने इस बहाने मानेसर प्रकरण की याद दिला दी। एक पुराना जख्म, जिसे समय ने भले ही भर दिया हो, पर घाव अब भी ताजा है।
यह वही प्रसंग है, जिसने राजस्थान कांग्रेस को दो खेमों में बांट दिया था। सवाल यह नहीं कि पायलट ने क्या किया था, सवाल यह है कि क्या पार्टी ने उसे सचमुच भुला दिया है? सियासत में विश्वास एक बार दरक जाए तो वह कांच की तरह हो जाता है जुड़ भी जाए तो दरारें दिखती रहती हैं। यही दरार इस पूरे घटनाक्रम में झलकती है। भाजपा का बयान तो एक बहाना भर था, असली कहानी कांग्रेस के भीतर की बेचैनी है। और इस बेचैनी को और गहरा बनाता है, पायलट का मौन। जब उनके पक्ष में पूरी पार्टी खड़ी दिखी, तब उनका खुद का चुप रहना क्या यह सियासत है या संकेत? सियासत में मौन कभी-कभी शब्दों से ज्यादा बोलता है। दूसरी तरफ, पायलट समर्थकों का गहलोत पर हमला यह बताता है कि सतह के नीचे लावा अब भी बह रहा है। ऊपर से एकजुटता का प्रदर्शन, भीतर से अविश्वास की चिंगारी यह वही द्वंद्व है जिसने पिछला चुनाव कांग्रेस के हाथ से फिसला दिया। तो क्या यह सब केवल एक बयान का असर है? या फिर यह उस अधूरे अध्याय की अगली कड़ी है, जिसे कांग्रेस बंद मान बैठी थी? सियासत में घटनाएं नहीं, उनके पीछे छिपी मन:स्थितियां सच बताती हैं। यहां मन अभी भी संशय में है। और जब पार्टी अपने ही नेता को लेकर आश्वस्त न हो, तो विरोधी के एक वाक्य से इतना बड़ा कंपन होना स्वाभाविक है। राजस्थान में कांग्रेस की कहानी फिलहाल यही कहती है कि फूट खत्म नहीं हुई, बस विराम पर है।

सच का संकट और
सुनने से इंकार का दौर
राजकाज हो या नौकरी, कभी आसान नहीं होते। यह कोई नई बात नहीं, लेकिन आज के समय में यह और भी जटिल हो गया है। सत्ता और नौकरी के गलियारों में जो कहा जाता है और जो किया जाता है, उनके बीच की दूरी अक्सर इतनी लंबी हो जाती है कि जनता या मालिक उस रास्ते को देख ही नहीं पाती। शब्दों का एक संसार खड़ा कर दिया जाता है, जहां हर वक्ता, दरअसल प्रवक्ता बन चुका है। वह अपनी आत्मा से नहीं, अपने पक्ष से बोलता है। और यही इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है। सच बोलना हमेशा कठिन रहा है, लेकिन आज यह लगभग असंभव-सा प्रतीत होता है। क्योंकि सच बोलने के लिए सिर्फ हिम्मत नहीं, त्याग भी चाहिए मोह का त्याग, संबंधों का त्याग, और कभी-कभी अपने ही बनाए दायरों का त्याग। यह त्याग हर किसी के बस की बात नहीं। इसलिए लोग सच से बचते हैं, उसे तोड़ते-मरोड़ते हैं या फिर उसे अपने हिसाब से गढ़ लेते हैं। सत्ताएं और नौकरियों का त्याग करना पड़ता है समाज और मालिकों की एक और विडंबना है, अगर आप किसी की तरफदारी नहीं करते, तो कोई आपकी बात सुनना ही नहीं चाहता।
तटस्थता अब गुण नहीं, दोष मानी जाने लगी है। लोग चाहते हैं कि आप उनके पक्ष में खड़े हों, उनकी भाषा बोलें, उनके ही निष्कर्ष दोहराएं। क्योंकि अधिकतर लोग सच नहीं, अपनी इच्छाओं की पुष्टि सुनना चाहते हैं। वे उस आवाज को पसंद करते हैं, जो उनके भीतर पहले से मौजूद है। हम सब अपने-अपने ‘सत्य’ लेकर चलते हैं, जो हमने अपने परिवार से, अपने गुरुओं से, अपने राजनीतिक या सामाजिक रहबरों से सुना है। और फिर हम मान लेते हैं कि यही अंतिम सत्य है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर हर कोई अपने को सही मानता है, तो गलत कौन है? और अगर कोई गलत है ही नहीं, तो फिर बहस, विमर्श और नए विचारों की जरूरत ही क्या रह जाती है? यहीं से संवाद का संकट शुरू होता है। जब सुनने की इच्छा खत्म हो जाती है, तब लोकतंत्र या संस्थान सिर्फ एक ढांचा बनकर रह जाता है। असल लोकतंत्र तो तब है, जब हम असहमति को सुन सकें, उसे समझने की कोशिश करें और शायद उससे कुछ सीख भी सकें। राजकाज की असली परीक्षा यही है क्या वह सच को सुनने की ताकत रखता है? और समाज की असली कसौटी भी यही है कि क्या वह अपने ही बनाए सच के बाहर झांकने की हिम्मत कर सकता है? यही हाल मालिकों का है। अपने इर्दगिर्द चापलूसों का जमघट रखते हैं। बेईमानी में जिनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता, वही उनके विश्वासपात्रों की सूची में टॉप पर होते हैं और जो सिर्फ इमानदारी से नौकरी करते है, संस्थान की बेहतरी के लिए जीते हैं, उनकी जरूरत न मालिक को होती है और न समाज को लेकिन सही व्यक्ति अपने सच्चाई के रास्ते पर अडिग रहता है, यही उसकी खासियत होती है।

अन्य समाचार