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फलसफा : अब मैं अपने साथ हूं

सना खान

इतना सब समझने के बाद खुद को खोने, फिर वापस पाने, और फिर खुद को बचाने के बाद एक सुकून धीरे-धीरे आ जाता है। अब मैं अपने साथ हूं। अब अकेलापन डराता नहीं क्योंकि अब मैं खुद से दूर नहीं हूं। पहले मुझे किसी के होने से सुकून मिलता था अब खुद के साथ होना ही काफी लगता है। अब हर खामोशी भारी नहीं लगती कुछ खामोशियां अब सुकून देती हैं। अब मुझे हर बात किसी से कहने की जरूरत नहीं क्योंकि अब मैं खुद को सुन लेती हूं। पहले मैं खुद से भागती थी, अब खुद के साथ बैठती हूं। और सच यह है कि पहले मैं अकेली नहीं थी, फिर भी खाली थी। अब मैं अकेली हूं, फिर भी पूरी हूं। और यहीं समझ आता है। शांति बाहर नहीं मिलती, वो अंदर बनती है। अब मैं किसी को पकड़कर नहीं रखती, न किसी से उम्मीद बांधती हूं। क्योंकि अब समझ आ गया है कि जो साथ रहना चाहता है, वो रहेगा और जो नहीं रहना चाहता, उसे रोकना जरूरी नहीं।
अब मैं किसी के जाने से खाली नहीं होती क्योंकि अब मैं खुद से भरी हूं। अब मैं हर किसी के साथ नहीं चलती क्योंकि अब मुझे हर रास्ता तय नहीं करना, बस सही रास्ता चुनना है। और अगर कभी पुरानी आदतें वापस बुलाती हैं तो इस बार मैं खुद को याद दिला देती हूं कि मैंने खुद को कितनी मुश्किल से पाया है। और इस बार मुझे किसी का साथ चाहिए या नहीं, यह मैं तय करूंगी। क्योंकि अब मैं खुद के खिलाफ नहीं जाऊंगी। और अब मैं हर दिन वैसी नहीं होती। कभी-कभी आज भी दिल किसी की तरफ भागता है। कभी पुरानी बातें याद आकर हल्का सा खालीपन छोड़ जाती हैं। पर फर्क बस इतना है कि अब मैं खुद को वापस बुला लेती हूं। अब मैं खुद को समझाती नहीं, बस थाम लेती हूं। अब मैं खुद से लड़ती नहीं, बस खुद के साथ बैठ जाती हूं। क्योंकि अब मुझे पता है कि ठीक होना मतलब दर्द का खत्म होना नहीं होता, बल्कि यह होता है कि अब दर्द हमें अपने खिलाफ नहीं करता। और शायद यही सुकून है। जब सब कुछ सही न होते हुए भी हम अंदर से ठीक होते जाते हैं। और इस बार मैं जहां भी जाऊं खुद से दूर नहीं जाऊंगी।

 

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