विजयशंकर चतुर्वेदी
हर साल १ मई को मजदूर दिवस पर ‘सम्मान’ और ‘कृतज्ञता’ के संदेशों की बाढ़ आ जाती है। जबकि मजदूरों की दुर्दशा, इसके लिए जिम्मेदार लोगों के धिक्कार की मांग करती है।
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के हालिया आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में युवा और प्रवासी मजदूर अस्थायी और असुरक्षित काम में फंसे हुए हैं। ऐसे में यह सम्मान दरअसल किसका है- श्रम का या उस व्यवस्था का जो श्रमिक को अदृश्य बना देती है?
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार, भारत में ८०–९० प्रतिशत से अधिक श्रमिकों के पास न स्थायी आय है, न सामाजिक सुरक्षा, न ही काम की गरिमा की कोई ठोस गारंटी। और बुनियादी हक मांगने पर, उनके साथ होता है देशद्रोहियों जैसा सलूक! क्या यही हमारा कृतज्ञता जताने का तरीका है?
नोएडा–मानेसर: दमन का
नया भूगोल
हाल के महीनों में नोएडा, ग्रेटर नोएडा और मानेसर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में जो कुछ हुआ है, वह केवल एक स्थानीय घटना नहीं है। मजदूरों की मांगें बेहद बुनियादी थीं- न्यूनतम वेतन का पालन, ओवरटाइम का भुगतान, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियां और सम्मानजनक व्यवहार। वे न गाड़ी मांग रहे थे, न बंगला—वे जिंदा रहने के लिए अपने श्रम का उचित मूल्य मांग रहे थे।
लेकिन जवाब क्या मिला? गिरफ्तारियां, नजरबंदी, पुलिसिया दबाव और एक खतरनाक नैरेटिव-कि यह सब किसी ‘साजिश’ का हिस्सा है। कई जगहों पर मजदूरों और उनके समर्थन में खड़े बुद्धिजीवियों को इस तरह पेश किया गया मानो वे ‘देश-विरोधी’ गतिविधियों में शामिल हों तो क्या अपना अधिकार मांगना अब ‘अपराध’ है? क्या न्यूनतम वेतन की बात करना ‘राष्ट्र-विरोध’ हो गया है?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है यानी लोकतांत्रिक असहमति को अब कानून-व्यवस्था के संकट के रूप में देखा जा रहा है। यह प्रवृत्ति केवल चिंताजनक नहीं, बल्कि खतरनाक है।
‘साजिश’ का नैरेटिव: असहमति का अपराधीकरण
सबसे गंभीर पहलू यह है कि मजदूर आंदोलनों को ‘नक्सल लिंक’ या ‘षड्यंत्र’ के चश्मे से देखा जा रहा है। शांतिपूर्ण विरोध करने वाले मजदूरों और उनके समर्थन में खड़े कलाकारों, लेखकों और पत्रकारों को ‘मास्टरमाइंड’ बताकर जेलों में डाला जा रहा है। गिरफ्तारी की प्रक्रियाओं का उल्लंघन—बिना मेमो, बिना परिवार को सूचना, वकीलों की पहुंच में बाधा- ये सब किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के संकेत नहीं हैं।
यह वही पैटर्न है जो हमने २०२० के उत्तर-पूर्वी दिल्ली की हिंसा के बाद देखा था, जहां हिंसा भड़कानेवाले खुले घूमते हैं और शांति की बात करने वाले जेल में डाल दिए जाते हैं। अब वही तर्क मजदूरों पर लागू किया जा रहा है। सवाल साफ है- क्या यह न्याय है या एक सुनियोजित चुप्पी थोपने की रणनीति?
विकास का मॉडल और श्रमिक की अदृश्यता
भारत की अर्थव्यवस्था को तेजी से बढ़ती हुई बताया जाता है, लेकिन इस विकास की असल कीमत कौन चुका रहा है? वही मजदूर, जो १०–१२ घंटे काम करने के बाद भी न्यूनतम वेतन के लिए संघर्ष करता है। वही प्रवासी श्रमिक, जो शहरों की पैâक्ट्रियों में काम करता है, लेकिन शहर का नागरिक नहीं बन पाता।
आंकड़े बताते हैं कि भारत में बड़ी संख्या में श्रमिक १०,०००-१५,००० रुपए मासिक आय पर काम करने को मजबूर हैं, जबकि महंगाई लगातार बढ़ रही है। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की पहुंच सीमित है और श्रम कानूनों के क्रियान्वयन में भारी खामियां हैं। ऐसे में ‘विकास’ का यह मॉडल दरअसल किसके लिए है?
अधिकारों का इतिहास: साझा संघर्ष और जिम्मेदारी
मजदूरों को जो भी अधिकार आज दिखाई देते हैं- आठ घंटे का कार्यदिवस, न्यूनतम वेतन, काम के घंटे और सुरक्षा से जुड़े नियम-वे किसी सहज दान का परिणाम नहीं हैं। १८८६ में हेमार्वेâट अफेयर के दौरान शिकागो के मजदूरों ने आठ घंटे काम के अधिकार के लिए ऐतिहासिक हड़ताल की थी, जिसमें कई मजदूरों और नेताओं ने अपनी जान तक गंवाई। उस संघर्ष ने पूरी दुनिया में श्रमिक आंदोलनों को दिशा दी और यह स्थापित किया कि अधिकार केवल मांगने से नहीं, बल्कि संगठित संघर्ष से हासिल होते हैं।
इतिहास यह भी बताता है कि अधिकार प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं होता—उन्हें बनाए रखना उससे भी कठिन है। हर दौर में सत्ता और पूंजीपतियों की ताकतें इन अधिकारों को सीमित करने या कमजोर करने की कोशिश करती रही हैं। आज जब फिर से श्रमिकों के बुनियादी अधिकारों पर चोट हो रही है, तो यह मान लेना भ्रम होगा कि चीजें अपने आप सुधर जाएंगी। यह वही समय है, जब अधिकारों की रक्षा के लिए फिर से संघर्ष का रास्ता अपनाना पड़ेगा।
इस संघर्ष में केवल मजदूर ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों की भागीदारी भी अनिवार्य है। क्योंकि यह सवाल सिर्फ एक वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे समाज के नैतिक ढांचे का है। अगर समाज खड़ा होता है, तभी अधिकार बचते हैं—वरना इतिहास बार-बार यह दिखा चुका है कि चुप्पी हमेशा अधिकारों के क्षरण का रास्ता बनाती है। इसलिए आम जनता को चाहिए कि भयंकर शोषण व दमन का शिकार मजदूरों के समर्थन में वह महानगरों से लेकर गांवों तक सड़क पर उतरे।
बधाई नहीं, प्रतिरोध का समय
मजदूर दिवस का अर्थ ‘उत्सव’ नहीं, बल्कि ‘संघर्ष’ है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि श्रमिक अधिकार किसी सरकार की कृपा से नहीं, बल्कि लंबे आंदोलनों से हासिल हुए हैं। आज जब मजदूर फिर से अपनी बुनियादी मांगों के लिए सड़कों पर हैं और बदले में उन्हें जेल, बदनामी और दमन मिल रहा है तो ‘बधाई’ का सवाल अपने आप में एक व्यंग्य बन जाता है।
क्या यह सम्मान है कि जो मजदूर देश की अर्थव्यवस्था को चलाते हैं, उन्हें ‘साजिशकर्ता’ कहा जाए। क्या यह सम्मान है कि उनकी आवाज को दबाने के लिए कानून का इस्तेमाल किया जाए? क्या यह सम्मान है कि उनके समर्थन में खड़े लोगों को भी अपराधी बना दिया जाए।
अगर इन सवालों का जवाब ‘नहीं’ है तो फिर यह समय बधाई देने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। यह समय यह कहने का है कि श्रम केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा का आधार है। जब तक यह गरिमा सुनिश्चित नहीं होती, तब तक मजदूर दिवस केवल एक औपचारिकता रहेगा- एक ऐसा दिन, जहां शब्दों में सम्मान होगा, लेकिन सच्चाई में अपमान।
और शायद यही इस समय की सबसे कड़वी सच्चाई है- कि मजदूर दिवस पर हमें बधाई नहीं, बल्कि प्रतिरोध की भाषा सीखनी होगी।
