मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : गोधरा ने दिया जहनियत बदलने का पैगाम

इस्लाम की बात : गोधरा ने दिया जहनियत बदलने का पैगाम

सैयद सलमान
मुंबई

गोधरा का नाम आते ही जेहन में एक खास तरह की बेचैनी जाग उठती है। २००२ में सिर्फ एक ट्रेन के डिब्बे में आग नहीं लगी थी, बल्कि दशकों तक वही आग सियासत की भट्ठी को भी गर्म रखने का ईंधन बनती रही। गोधरा को नफरत के भूगोल का एक स्थायी पड़ाव बनाए रखने में जिन्हें सबसे ज्यादा दिलचस्पी रही, उन्हीं को इस शहर के मुस्लिम मतदाताओं ने अप्रैल २०२६ के स्थानीय निकाय चुनाव में करारा जवाब दिया है।
डर की राजनीति की विदाई!
नफरत की सियासत का अपना एक मखसूस व्याकरण होता है। उसका एक पुराना और आजमाया हुआ नुस्खा है, हर चुनाव से पहले समाज को दो हिस्सों में बांट दो, फिर हर हिस्से को दूसरे से डरा दो। इस डर की फसल पर वोटों की राजनीति लहलहाती है और सत्ता की कुर्सियां सुरक्षित होती हैं। गोधरा जैसा संवेदनशील शहर इस खेल के लिए हमेशा उपजाऊ जमीन माना जाता रहा। लेकिन इस बार स्थानीय मतदाताओं ने उस पटकथा को उलट दिया, जो दशकों से उनके लिए लिखी जाती रही थी।
गोधरा के वार्ड नंबर-७ में, जहां मतदाताओं की तकरीबन ९५ से ९८ फीसद आबादी मुस्लिम है, वहां के मतदाताओं ने अपेक्षाबेन सोनी नामक एक निर्दलीय हिंदू महिला को भारी बहुमत से अपना रहनुमा चुनकर एक ऐसा पैâसला दिया है, जो ‘डर की राजनीति’ की विदाई का संकेत है। यह उस सियासत की विदाई है जो मजहब के नाम पर रोटियां सेंकती रही है।
अपेक्षाबेन ने अपने चुनाव प्रचार में न तो मजहबी मुद्दों का सहारा लिया और न ही भावनात्मक नारों का। उन्होंने अपना चुनाव सड़क, पानी, सफाई और सेहत जैसे उन बुनियादी सवालों पर केंद्रित रखा, जिनका मजहब से कोई लेना-देना नहीं होता। वार्ड के मतदाताओं ने भी तय किया कि उन्हें मजहबी प्रतीक नहीं, काम करनेवाला प्रतिनिधि चाहिए। नतीजा सामने है।
रक्षात्मक मुद्रा
मुस्लिम समाज के लिए यह पैâसला एक बड़े मनोवैज्ञानिक बदलाव का संकेत है। दशकों से मुस्लिम समाज के सामने वोट देने का पैमाना ‘बेहतरी की उम्मीद’ न होकर ‘कमतर नुकसान करनेवाले का चुनाव’ रहा है। वह हमेशा इस उलझन में रहा कि कौन उसे कम डराएगा या कौन उसके अस्तित्व पर कम चोट करेगा। उनका वोट अक्सर ‘पसंद’ का नहीं, बल्कि ‘बचाव’ का हथियार होता है। इस सोच ने मुस्लिम मतदाता को एक ऐसे दबे हुए समूह में तब्दील कर दिया, जो हमेशा रक्षात्मक मुद्रा में रहता है। गोधरा ने इस मुद्रा को तोड़ा है। जब कोई समाज धर्म और जाति से ऊपर उठकर योग्यता को वोट देता है, तो वह सिर्फ एक उम्मीदवार को नहीं जिताता, वह एक नई राजनीतिक संस्कृति के बीज बोता है।
राजनेताओं को ध्रुवीकरण का खेल पसंद है। दरअसल, ध्रुवीकरण की सियासत एक ऐसा छलावा है, जो बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों को एक-दूसरे का भय दिखाकर असलियत से दूर ले जाता है। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान उस तबके का होता है जो पहले से ही सामाजिक और आर्थिक हाशिए पर है। यह सोचने की जरूरत है कि ध्रुवीकरण की राजनीति आखिर फायदा किसको पहुंचाती है। मुसलमानों को तो कतई नहीं।
गौरतलब है कि जितनी बार सांप्रदायिक माहौल गर्म होता है, उतनी बार मुस्लिम समाज की शिक्षा, रोजगार, आर्थिक पिछड़ापन, सामाजिक सुरक्षा जैसी असल समस्याएं पीछे धकेल दी जाती हैं। जो ताकतें समाज में नफरत की धुंध पैâलाती हैं, वे जानती हैं कि जब तक यह धुंध बनी रहेगी, तब तक बुनियादी सवालों की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाएगा।
लेकिन लोकतंत्र का असली हुस्न यह है कि वह कट्टरता की कोख से भी उम्मीद की किरणें पैदा कर सकता है। जिस गोधरा को नफरत का प्रतीक बनाया गया, वही अब सुलह और समझदारी का नया ‘गोधरा मॉडल’ बनकर उभर रहा है। यह उन लोगों के लिए एक कड़ा सबक है जो नफरत को एक मुनाफे वाला बिजनेस समझते हैं। यह जीत बताती है कि अवाम अब उस ‘लेबोरेटरी’ से बाहर निकलना चाहती है जहां उन्हें मजहबी पहचान के खांचों में बांटकर परखा जाता था। गोधरा का यह ‘मॉडल’ इसीलिए काबिले तारीफ है। यह परिपक्वता का प्रमाण है। सियासत के दलदल में यह एक साफ कदम है।
मजबूत लोकतंत्र
देश की राजनीति का स्तर जिस तेजी से गिरा है, उसे देखकर मन भारी होता है। संसद से लेकर सड़क तक, रचनात्मक बहस की जगह उग्र बयानबाजी ने ले ली है। मुद्दों की जगह भावनाओं ने और नीति की जगह नफरत ने ले ली है। इस माहौल में गोधरा का यह नतीजा एक झरोखे की तरह है, जहां से ताजी हवा आती महसूस होती है।
लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब कोई भी समाज ‘वोट बैंक’ की संकीर्णता से बाहर निकलकर एक जागरूक शहरी की तरह व्यवहार करता है। गोधरा ने नफरत के सौदागरों को जवाब दे दिया है। अब बारी देश के बाकी हिस्सों की है कि वे इस पैगाम को कितनी गहराई से समझते हैं।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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