अनिल तिवारी
मुंबई
भाग-२
मुंबई का ट्रैफिक हर दिन एक जैसा नहीं होता। सोमवार की सुबह, शुक्रवार की शाम, शनिवार की बाजार भीड़, रविवार का धार्मिक या पर्यटन ट्रैफिक, स्कूल खुलने-बंद होने का समय, बारिश का दिन, त्योहार, राजनीतिक कार्यक्रम, क्रिकेट मैच, मेट्रो निर्माण, सड़क खुदाई हर परिस्थिति में ट्रैफिक पैटर्न बदलता है। इसलिए सिस्टम को केवल आज का डेटा नहीं, बल्कि वीकली, मंथली और सीजनल पैटर्न भी सीखना होगा।
मुंबई को ट्रैफिक जाम से वास्तविक राहत तब मिलेगी, जब पूरा सिग्नलिंग सिस्टम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़कर एक एडवांस इंटीग्रेटेड सिस्टम में बदलेगा। अभी कई सिग्नल्स का संचालन पूर्व निर्धारित डेटा, पुराने टाइमर या जरूरत पड़ने पर मैनुअल हस्तक्षेप से होता है। यह व्यवस्था मुंबई जैसे गतिशील शहर के लिए अपर्याप्त है। मुंबई को प्री-कंट्रोल्ड सिस्टम से आगे बढ़कर एआई बेस्ड रीयल टाइम ट्रैफिक कंट्रोल एंड मैनेजमेंट सिस्टम अपनाना होगा। ऐसा सिस्टम केवल किसी एक जंक्शन को नहीं, बल्कि पूरी सड़क, पूरे
कॉरिडोर और अंतत: पूरे महानगरीय क्षेत्र को पढ़ें। हर सिग्नल, हर प्रमुख जंक्शन, हर फ्लाईओवर, हर सर्विस रोड, हर बस
स्टॉप और हर प्रमुख मोड़ से डेटा केंद्रीय कमांड सेंटर तक पहुंचे। वहां से एआई यह विश्लेषण करे कि किस सड़क पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ रहा है, कहां वाहन रुक रहे हैं, कहां गति गिर रही है, किस दिशा में कतार लंबी हो रही है और कहां वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध है।
स्मार्ट सिग्नलिंग
इस व्यवस्था में सड़क किनारे लगे सेंसर, हाई-रिजॉल्यूशन सीसीटीवी, स्पीड डिटेक्शन वैâमरे, ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन, जीपीएस डेटा, बसों और सार्वजनिक परिवहन की लोकेशन, आपातकालीन वाहनों की स्थिति, ट्रैफिक पुलिस इनपुट, मौसम डेटा, दुर्घटना रिपोर्ट और नागरिक सूचना, इन सबको जोड़ना होगा। तभी सिग्नल वास्तव में इंटेलिजेंट कहलाएगा।
स्मार्ट सिग्नलिंग का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होगा, रीयल टाइम सिग्नल टाइमिंग। यदि किसी दिशा में वाहनों की संख्या अचानक बढ़ती है, तो सिग्नल अपने आप हरी बत्ती की अवधि बढ़ा सके। यदि किसी दिशा में वाहन कम हैं, तो वहां अनावश्यक लंबी हरी बत्ती न दी जाए। यदि किसी जंक्शन से आगे बॉटलनेक है और वाहन आगे जाकर अटक रहे हैं, तो पीछे का सिग्नल वाहनों की आपूर्ति नियंत्रित करे, ताकि जाम जंक्शन के बीच न फंसे। यह ट्रैफिक मीटरिंग और एडैप्टिव कंट्रोल का मिश्रित मॉडल होगा।
दूसरा महत्वपूर्ण तत्व होगा, ग्रीन वेव सिस्टम। यदि कोई वाहन निर्धारित गति सीमा का पालन करते हुए किसी सड़क पर चल रहा है, तो उसे क्रमश: आगे के सिग्नल हरे मिलें। उदाहरण के लिए, कोई वाहन ५ किलोमीटर लंबे शहरी मार्ग पर ४० किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चल रहा है। यदि उस मार्ग के सभी सिग्नल आपस में जुड़े हों, तो एआई वाहन समूहों की औसत गति के आधार पर आगे की हरी बत्ती का क्रम बना सकता है। इससे वाहन बार-बार रुकेंगे नहीं। चालक को भी यह प्रेरणा मिलेगी कि यदि वह गति सीमा का पालन करेगा, तो उसे सुगम मार्ग मिलेगा। इस मॉडल को और प्रभावशाली बनाने के लिए सड़क के डिवाइडर और स्ट्रीट लाइट पोल्स का उपयोग किया जा सकता है। मुंबई में कई जगह सजावट के लिए एलईडी स्ट्रिप्स लगाई जाती हैं। इन्हीं पोल्स को ट्रैफिक सूचना प्रणाली में बदला जा सकता है। यदि आगे का सिग्नल हरा है, तो उस दिशा की एलईडी हरी दिखे। यदि आगे लाल सिग्नल आने वाला है, तो पहले पीली और फिर लाल चेतावनी दिखे। इन्हीं पोल्स पर उस मार्ग की निर्धारित गति सीमा भी दिखाई जा सकती है। इससे वाहन चालक को दूर से ही पता रहेगा कि आगे की स्थिति क्या है और उसे किस गति से चलना है। इस स्मार्ट रोड मॉडल में वाहन चालक का अनुभव पूरी तरह बदल सकता है। यदि वह निर्धारित गति सीमा में रहता है और लगातार उसी मार्ग पर चलता है, तो संभव है कि उसे अधिकांश सिग्नल हरे मिलें। यदि वह अचानक मोड़ लेता है, गलत लेन में जाता है या गति सीमा का उल्लंघन करता है, तो उसे सिग्नल पर रुकना पड़े। यानी सिस्टम दंड से पहले अनुशासन के लिए प्रोत्साहन देगा। यह सड़क पर स्वैच्छिक नियम पालन को बढ़ाने का अत्यंत प्रभावी तरीका हो सकता है।
तीसरा महत्वपूर्ण तत्व होगा, ट्रैफिक डिफरेंस मॉनिटरिंग।
बच सकती हैं जिंदगियां
मुंबई का ट्रैफिक हर दिन एक जैसा नहीं होता। सोमवार की सुबह, शुक्रवार की शाम, शनिवार की बाजार भीड़, रविवार का धार्मिक या पर्यटन ट्रैफिक, स्कूल खुलने-बंद होने का समय, बारिश का दिन, त्योहार, राजनीतिक कार्यक्रम, क्रिकेट मैच, मेट्रो निर्माण, सड़क खुदाई हर परिस्थिति में ट्रैफिक पैटर्न बदलता है। इसलिए सिस्टम को केवल आज का डेटा नहीं, बल्कि वीकली, मंथली और सीजनल पैटर्न भी सीखना होगा। Aघ् को यह समझना होगा कि किस दिन किस मार्ग पर दबाव बढ़ता है, कौन-से जंक्शन किस समय बॉटलनेक बनते हैं और किस मौसम में कौन-सी सड़क धीमी होती है।
चौथा तत्व होगा, ट्रैफिक एडवायजरी और नागरिक अलर्ट। स्मार्ट सिस्टम केवल सिग्नल बदलने तक सीमित न रहे। वह वाहन चालकों को सूचना दे। मोबाइल ऐप, डिजिटल बोर्ड, कार नेविगेशन, रेडियो, सार्वजनिक परिवहन डिस्प्ले और ट्रैफिक पुलिस चैनल के माध्यम से नागरिक को बताया जाए कि आगे दुर्घटना है, कौन-सा मार्ग बंद है, कहां भारी जाम है, कौन-सा वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध है, किस सड़क पर जलभराव है, कहां वीआईपी मूवमेंट है और किस कॉरिडोर में ग्रीन वेव उपलब्ध है। इससे नागरिक भी निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनेगा।
पांचवां तत्व होगा, आपातकालीन ग्रीन कॉरिडोर। एंबुलेंस, फायरब्रिगेड, पुलिस वाहन और आपदा राहत वाहनों को जीपीएस आधारित प्राथमिकता दी जाए। जैसे ही एंबुलेंस किसी मार्ग पर निकले, सेंट्रल कमांड सेंटर उसके आगे के सिग्नल्स को क्रमश: हरा करे। एलईडी पोल्स और डिजिटल बोर्ड्स अन्य वाहन चालकों को सूचित करें, ‘आपातकालीन वाहन आ रहा है, कृपया रास्ता दें।’ मुंबई जैसे शहर में यह व्यवस्था जीवन बचा सकती है।
छठा तत्व होगा, नंबर प्लेट रिकग्निशन और स्पीड डिटेक्शन। यदि सिस्टम में ‘एएनपीआर’ यानी ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन और स्पीड डिटेक्शन जुड़ जाए, तो कई समस्याएं एक साथ संभाली जा सकती हैं। वाहन चोरी, फर्जी नंबर प्लेट, बार-बार सिग्नल तोड़ना, गलत दिशा में चलना, ओवरस्पीडिंग, रफ ड्राइविंग, रेस ड्राइविंग और बाइक रेसिंग जैसी समस्याओं पर अंकुश लग सकता है। लेकिन इसका उद्देश्य केवल जुर्माना वसूलना नहीं होना चाहिए। सिस्टम को पहले चेतावनी, फिर सुधार, फिर दंड की नीति अपनानी चाहिए।
ईंधन-समय बचत
सातवां तत्व होगा, रीयल टाइम फाइन और रिस्क प्रोफाइलिंग। जो वाहन बार-बार सिग्नल तोड़ते हैं, गलत लेन में चलते हैं, रफ ड्राइविंग करते हैं या तेज गति से खतरनाक व्यवहार दिखाते हैं, उन्हें केवल सामान्य चालान न मिले, उनका रिस्क प्रोफाइल बने। ऐसे वाहनों को स्वैâनर और एआई वैâमरे स्वत: पहचानें। यदि कोई वाहन लगातार उल्लंघन कर रहा है, तो उसे आगे सुरक्षित स्थान पर रोककर चालक की जांच, लाइसेंस समीक्षा या वाहन निरीक्षण किया जा सके। इससे कानून मानने वाले नागरिकों को अनावश्यक रोका नहीं जाएगा, लेकिन आदतन नियम तोड़नेवालों पर सख्ती होगी।
आठवां तत्व होगा, पीयूसी और इंश्योरेंस की ऑनलाइन जांच। आज सड़क पर वाहनों को रोककर झ्ळण्, इंश्योरेंस या अन्य कागजात जांचे जाते हैं। इससे ट्रैफिक बाधित होता है। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि वाहन नंबर प्लेट या डिजिटल टैग से स्वैâन होते ही पता चल जाए कि किस वाहन का इंश्योरेंस समाप्त है, किसका झ्ळण् नवीनीकृत नहीं हुआ, किसका फिटनेस सर्टिफिकेट लंबित है और किस पर लंबित जुर्माने हैं। ऐसे वाहनों को ही आगे रोककर जांचा जाए। बाकी वाहन बिना बाधा आगे बढ़ें। इससे ट्रैफिक भी बचेगा और नियम पालन भी बेहतर होगा।
नौवां तत्व होगा, ईंधन-बर्बादी और प्रदूषण की गणना। मुंबई में यदि दोनों दिशाओं की यात्रा में रोजाना आधा-आधा घंटा अतिरिक्त लगता है, तो लाखों वाहनों के स्तर पर यह समय और ईंधन की विशाल बर्बादी है। ट्रैफिक सिग्नल पर खड़ा वाहन इंजन चालू रखकर प्रति मिनट ईंधन जलाता है। दोपहिया, कार, बस, ट्रक और डीजल मालवाहक वाहन सभी अपनी श्रेणी के अनुसार ईंधन खर्च करते हैं। यदि एआई आधारित सिग्नलिंग से रुकने का समय घटता है, तो ईंधन बचत, उत्सर्जन कमी और नागरिक समय-बचत का आर्थिक मूल्य निकाला जा सकता है। मुंबई को अपने पायलट प्रोजेक्ट से स्थानीय डेटा तैयार करना चाहिए कि स्मार्ट सिग्नलिंग से प्रतिदिन कितने लीटर ईंधन और कितने मानव-घंटे बच सकते हैं।
दसवां तत्व होगा, केंद्रीकृत कमांड एंड कंट्रोल सेंटर। यह पूरे सिस्टम का मस्तिष्क होगा। यहां २४ घंटे निगरानी हो। हर सड़क, हर प्रमुख जंक्शन, हर कॉरिडोर, हर बस रूट और हर ट्रैफिक घटना का लाइव डेटा उपलब्ध हो। ट्रैफिक पुलिस, आरटीओ, बीएमसी, एमएमआरडीए, एमएसआरडीसी, बेस्ट, मेट्रो, रेलवे, आपदा प्रबंधन और एंबुलेंस नेटवर्क सभी का डेटा एकीकृत हो। तभी मुंबई की ट्रैफिक व्यवस्था टुकड़ों में नहीं, एक समग्र महानगरीय प्रणाली के रूप में काम कर सकेगी।
