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रुख-ए-सियासत : युद्ध, ऊर्जा और नई दुनिया का खाका … परदे के पीछे चल रहा असली खेल

तौसीफ कुरैशी

दुनिया के नक्शे पर जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह पूरा सच नहीं है। सच हमेशा सतह के नीचे होता है धीरे, ठंडे दिमाग से, योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ता हुआ। आज अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जो तनाव है, उसे सिर्फ एक क्षेत्रीय संघर्ष मानना बड़ी भूल होगी। यह उस बड़े खेल का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी और जिसका मकसद सिर्फ एक देश को हराना नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था को बदलना है। २०१४ में यूक्रेन से शुरू हुआ अध्याय दरअसल इस कहानी का पहला खुला पन्ना था। अदृश्य शक्तियों द्वारा रूस को घेरने की पूरी कोशिश हुई, उसे आर्थिक और सामरिक जाल में फंसाने का प्रयास किया गया। लेकिन रूस ने इस खेल को समझ लिया। उसने अपनी रणनीति बदली, चीन के साथ रिश्ते मजबूत किए और धीरे-धीरे एक वैकल्पिक धुरी तैयार कर ली। यह वही समय था जब दुनिया दो हिस्सों में बंटने लगी एक पुरानी ताकतों का, दूसरा उभरती शक्तियों का। आज ईरान उस दूसरे धड़े की सबसे अहम कड़ी बन चुका है। उस पर दबाव है, हमले हैं, प्रतिबंध हैं लेकिन वह टूटा नहीं है। यही सबसे बड़ा संकेत है कि यह लड़ाई सिर्फ हथियारों की नहीं, बल्कि धैर्य और रणनीति की भी है। ईरान की संरचना, उसकी राजनीतिक इच्छाशक्ति और उसके पीछे खड़ी शक्तियां यह सब मिलकर उसे टिकाए हुए हैं। गाजा से लेकर तेहरान तक जो कुछ हो रहा है, वह अचानक नहीं है। यह एक क्रम है। पश्चिमी दुनिया ने इसे अपने तरीके से डिजाइन किया, लेकिन जवाब भी उतनी ही तैयारी के साथ आया है। रूस और चीन ने ऊर्जा, व्यापार और कनेक्टिविटी के नए रास्ते बनाकर उस दबाव को कमजोर कर दिया है, जिस पर पश्चिम का नियंत्रण था।
सबसे बड़ा बदलाव ऊर्जा के खेल में दिख रहा है। तेल अब सिर्फ ईंधन नहीं, बल्कि हथियार बन चुका है। दुनिया में डॉलर की पकड़ ढीली पड़ रही है लेकिन फादरलैंड के मदरलैंड में वही डॉलर अपना डंका बजा रहा है, उसकी वजह डॉलर का मजबूत होना नहीं है, बल्कि महामानव नॉन बॉयोलॉजिकल की इंसानियत के दुश्मन और मासूमों के कातिल से मोहब्बत और एपस्टीन की फाइलों में अपनी करतूतों को छुपाने के लिए देश की कूटनीति को दांव पर लगा दिया ऐसे आरोप लग रहे हैं और महामानव खामोशी की चादर ओढ़े चुनावों में वैâसे जीता जाए, कौन सी तिगड़म लगाकर या झूट बोलकर। खैर अगर तेल का व्यापार धीरे-धीरे दूसरी मुद्राओं जैसे युआन में शिफ्ट होता है, तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बदलने जैसा होगा। खाड़ी देश, जो अब तक एकजुट दिखते थे, उनके भीतर भी अलग-अलग खेल चल रहे हैं। बाहर से सहयोग, अंदर से प्रतिस्पर्धा यही उनकी नई रणनीति है। तुर्की का उभार भी इसी कहानी का हिस्सा है। इतना ही नहीं एक तरह से ऑटोमन एंपायर का आकार बनता जा रहा है, ऐसा सबकुछ जल्दी ही नजर आने लगेगा। वह सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि एक संभावित धुरी के रूप में उभर रहा है, जहां सैन्य, कूटनीति और भू-राजनीति एक साथ मिलती हैं। अगर आने वाले समय में इस क्षेत्र में कोई नया गठजोड़ बनता है, तो उसमें तुर्की की भूमिका निर्णायक होगी। अब सवाल यह है कि इस युद्ध में जीत किसकी होगी? सच यह है कि यह युद्ध पारंपरिक अर्थों में कोई नहीं जीतेगा। लेकिन हार बहुतों की होगी। यूरोप की अर्थव्यवस्था पहले से दबाव में है। अमेरिका की वैश्विक पकड़ चुनौती में है। संघियों के फादरलैंड इजरायल के सामने अस्तित्व का संकट आएगा। ईरान भी बिना नुकसान के नहीं बचेगा। यह एक ‘विन-विन’ नहीं, बल्कि ‘लूज-लूज’ संघर्ष है, जहां हर पक्ष कुछ खोएगा, लेकिन अंत में जो बचेगा, वही नई दुनिया का ढांचा तय करेगा। और यही इस पूरे खेल का सबसे खतरनाक पहलू है नई दुनिया बन रही है, लेकिन उसमें पुराने नियम लागू नहीं होंगे। भारत जैसे देशों के लिए यह समय सिर्फ देखने का नहीं, समझने का है। कूटनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा तीनों मोर्चों पर नई सोच की जरूरत है। क्योंकि जो देश इस बदलाव को समय रहते नहीं समझेंगे, वे सिर्फ दर्शक बनकर रह जाएंगे। दुनिया बदल रही है। भारत का मौजूदा नेतृत्व लगा है हिंदूू-हिंदू भाई-भाई खेलने में और मुसलमानों, सिखों व ईसाइयों के खिलाफ नफरत पैâलाने में। सवाल यह नहीं कि कौन जीतेगा, सवाल यह है कि इस बदलाव के बाद आप किस तरफ खड़े होंगे, यह समझने की जरूरत है।
सत्यमेव जयते

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