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मुस्लिम तुष्टिकरण, भ्रष्टाचार एवं भय के डर ने ममता को प. बंगाल से कराई विदाई

अनिल मिश्र / कोलकाता

प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को पहली बार वोट डालने आए युवा एवं नौजवानों ने भी पन्द्रह साल पुरानी ममता बनर्जी सरकार को खारिज कर दिया। इसका कारण मेडिकल कॉलेज छात्रा आरजी कर की घटना के अलावा राज्य का औद्योगिक माहौल और रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं होना है। नौकरियां नहीं होने के कारण प. बंगाल के छात्र बड़े पैमाने पर उच्च शिक्षा एवं नौकरी के लिए दक्षिण भारतीय शहरों का रुख करते रहे हैं। बीते करीब एक दशक में इस पलायन में काफी तेजी आई है, जबकि अंग्रेजी हुकूमत में लगभग सभी उत्तर भारतीय रोजगार की तलाश में प. बंगाल और खासकर कोलकाता का रूख अख्तियार करते थे। प. बंगाल में ममता सरकार के खिलाफ नाराजगी के कारण ही प्रवासी बंगालियों ने इस बार बड़े पैमाने पर यहां लौटकर एवं अपने काम धंधा को छोड़कर तृणमूल के खिलाफ मतदान किया। वहीं ममता की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को अपना चुनावी मुद्दा बनाने के कारण भाजपा को तृणमूल के खिलाफ गैर-बंगाली और बंगाली हिंदू वोटरों को लामबंद करने में मदद मिली, खासकर शहरी इलाके के वोटरों में सरकार के खिलाफ काफी नाराजगी थी और उनमें ध्रुवीकरण सबसे ज्यादा देखने को मिला। तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ समझे जाने वाले शहरी इलाकों के नतीजे इस बात की पुष्टि करते हैं।भाजपा ने अपने अभियान में सीमा पार घुसपैठ के अलावा सरकार के भ्रष्टाचार को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था। तृणमूल कांग्रेस से मुकाबले के लिए पार्टी इस बार ममता बनर्जी पर सीधा हमला करने से परहेज करती रही। इसके साथ ही वह ऐसी किसी टिप्पणी से बचती रही, जो बांग्ला अस्मिता को ठेस पहुंचा सके। इसी वजह से वह इस बार जय श्री राम की बजाय जय मां काली के नारे ही ज्यादा लगाती नजर आई।
2010 के दशक के मध्य तक, टीएमसी कोलकाता-केंद्रित पार्टी से बंगाल भर में मजबूत जमीनी उपस्थिति वाली पार्टी के रूप में सफलतापूर्वक परिवर्तित हो चुकी थी। हालांकि, इस सुदृढ़ीकरण के दौर के साथ-साथ कई आरोप भी लगे, जिन्होंने सरकार की छवि को धूमिल करना शुरू कर दिया।सारदा चिट फंड घोटाला और नारदा स्टिंग ऑपरेशन ने भ्रष्टाचार के सवालों को सामने ला दिया, जबकि सिंडिकेट राज और जबरन वसूली के लगातार आरोपों ने शासन और राजनीतिक संस्कृति के बारे में चिंताओं को बढ़ा दिया।इन समस्याओं के बावजूद, एक एकजुट विपक्ष की अनुपस्थिति का मतलब था कि चुनावी चुनौतियाँ सीमित रहीं। इसका आंशिक कारण कथित राजनीतिक धमकियों और हिंसा का माहौल था। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 2016 और 2021 दोनों विधानसभा चुनावों में शानदार जीत हासिल की, हालांकि 2019 के लोकसभा चुनावों में उसकी लोकप्रियता में गिरावट आई। लेकिन 2021 के जनादेश के बाद के वर्षों में, कथित अनियमितताओं की एक शृंखला ने जाँच को और भी तेज कर दिया। जबकि शिक्षक भर्ती घोटाले, राशन वितरण घोटाले, नगरपालिका भर्ती अनियमितताओं और कोयला और पशु तस्करी के मामलों की जांच के परिणामस्वरूप एक राज्य मंत्री और कई विधायकों सहित वरिष्ठ हस्तियों को गिरफ्तार किया गया। वहीं प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाइयों के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी की बरामदगी ने राजनीतिक नतीजों को और बढ़ा दिया, जिसके चलते विपक्षी दलों ने सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व को निशाना बनाया। वहीं 2019 मेंममता बनर्जी ने टिप्पणी की थी कि वह दूध देने वाली गाय से लात खाने के लिए तैयार हैं। इस टिप्पणी की उनके आलोचकों ने अल्पसंख्यक-केंद्रित राजनीतिक पहुँच की स्वीकृति के रूप में व्याख्या की थी।तब से लेकर अब तक, भाजपा ने उस बयान को एक ऐसी रणनीति के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया है जिसे वे तुष्टीकरण रणनीति कहते हैं। ऐसा तर्क जिसने बंगाल के ध्रुवीकृत राजनीतिक माहौल में जोर पकड़ा है।2016 के बाद, जब नरेंद्र मोदी केंद्र में मजबूती से सत्ता में आ गए, तो बंगाल में राजनीतिक बहस और भी तीखी हो गई।भाजपा ने अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के आरोपों को लेकर अपना अभियान तेज कर दिया। इस दौरान कैनिंग, देगांगा, हावड़ा, बशीरहाट और आसनसोल जैसे जिलों में सांप्रदायिक तनाव की छिटपुट घटनाएं भी देखने को मिलीं, जिससे प्रशासनिक प्रतिक्रिया और कानून व्यवस्था प्रबंधन पर सवाल उठने लगे। वहीं विधानसभा चुनाव में 15 साल की सत्ता विरोधी लहर, भ्रष्टाचार के आरोप, कानून-व्यवस्था के मुद्दे, रिकॉर्ड मतदान और युवाओं का गुस्सा जैसे कई बड़े फैक्टर सामने आए। भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए स्थानीय नेताओं को आगे किया और चुनाव को मुद्दों पर केंद्रित रखा। जिसके कारण 34 सालों से प. बंगाल में वाम मोर्चा की रही सरकार को 15 साल पहले तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी ने घूल चटाकर सता में आयीं थी। उसी तरह भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी की सरकार के खिलाफ बंपर वोटिंग पाकर आजादी के बाद पहली बार सरकार बनाने जा रही है।

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