मुख्यपृष्ठस्तंभसंडे स्तंभ :  सूर्योदय के देश से हैट्स ऑफ, हाचिको!

संडे स्तंभ :  सूर्योदय के देश से हैट्स ऑफ, हाचिको!

विमल मिश्र

स्वामिभक्ति और निष्ठा के लिए पशुओं में जिस तरह महाराणा प्रताप का ‘चेतक’ भारत में सर्वाधिक आदर का पात्र है, जापान में वही स्थान हाचिको को हासिल है। शिबुआ स्टेशन के बाहर लगी उसकी प्रतिमा के साथ फोटो खिंचानेवालों की लंबी लाइन देख लीजिए।

जापान के जिस कावागुचिको रिसॉर्ट में हम ठहरे हैं नगाधिराज फुजी हमसे बिल्कुल आमने-सामने नजरें मिला रहा है। साथी पर्यटक के कुत्ते से लाड़ लड़ाते अचानक ‘हाचिको’ का ध्यान आता है, जिससे कुछ दिन पहले ही हम टोक्यो के शिबुया ट्रेन स्टेशन पर दो-चार होकर आए हैं, जापान का सबसे मशहूर कुत्ता, जिसे आइंदा हमारी हिचकियां अमर रखनेवाली हैं।
शेरू, मोती, शेरू, टॉमी, ब्लैकी और टाइगर-भारत में पालतू कुत्तों के कुछ प्रचलित नाम हैं। जापान में कुत्तों के नाम के साथ ही सम्मान जुड़ा है, लगभग वही सम्मान, जो हमारे देश में गोमाता को प्राप्त है। टोक्यो या यहां के किसी भी शहर-गांव के फुटपाथों पर घूमते-टहलते आपको आम जापानी सजे-धजे मिनी साइज कुत्तों को अपनी संतानों की तरह प्यार बरसाते, प्रोम पर सैर कराते, खास बोतलों से पानी पिलाते, डॉग पार्लरों में साज-संभाल करते, यहां तक कि रास्तों पर उनकी (विष्टा) तक साफ करते भी दिख जाएंगे (इस हिमाकत के लिए यहां भारी जुर्माना है)। जापान में कुत्तों को आदर का दर्जा हासिल है और हाचिको को तो देवत्व का। हाचिको संभवत: न सिर्फ जापान, बल्कि विश्व का सबसे मशहूर कुत्ता है। जनचेतना में मिथक की तरह।
मुंबई का ‘सेंट बर्नार्ड’ और टोक्यो का ‘हाचिको’
मुंबई में फोर्ट इलाके की वुडबी रोड पर प्रविष्ट होते ही टाटा औद्योगिक घराने के संस्थापक जमशेदजी टाटा के विशाल महल एस्प्लेनेड हाउस के द्वार पर स्मारक रूप में उनके स्वामिभक्त पालतू कुत्ते सेंट बर्नार्ड की कांस्य प्रतिमा दिखती है। टाटा घराने ने अपने मुख्यालय बॉम्बे हाउस में तो बाकायदा एक कुत्ता घर भी बना रखा है। हाचिको की भी ऐसी ही एक प्रतिमा विश्व की सबसे विशाल क्रॉसिंग वाले टोक्यो के शिबुया ट्रेन स्टेशन (जिसका वर्णन आपने इसी स्तंभ में पिछले सप्ताह पढ़ा) से मुश्किल से ५० कदम की दूरी पर स्थापित है।
वफादारी का अनूठा प्रतीक
स्वामिभक्ति और निष्ठा के लिए पशुओं में जिस तरह महाराणा प्रताप का ‘चेतक’ भारत में सबसे अधिक आदर का पात्र है, वही स्थान जापान में हाचिको का है। विश्वभर में किसी कुत्ते को इतने इतना बड़ा सम्मान शायद ही कहीं मिला हो। बस, ‘हाचिको’ नाम से गूगल कीजिए, आपको लाखों नतीजे दिखने लगेंगे। इन जनाब पर जापान की पाठ्य पुस्तकों में चैप्टर हैं, विश्वभर की भाषाओं में उस पर दसियों फिल्में बनी हैं, ढेरों कविताएं हैं और सैकड़ों किताबें लिखी जा चुकी हैं। शिबुया स्टेशन के बाहर जब मैं पत्नी के साथ था, हमने चौराहे पर लगी इसकी प्रतिमा पर फोटो खिंचवाने वालों- जिनमें विदेशी पर्यटक सबसे अधिक थे- की लंबी लाइन लगी देखी, जो धीरज से अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। हाचिको के साथ तस्वीर खिंचवाने के सम्मोहन से हम भी बच नहीं पाए। वर्षों से टोक्यो का एक प्रबल आकर्षण बना है हाचिको का यह स्मारक। दुनिया का सबसे मशहूर ‘पशु तीर्थ’ भी संभवत: यही होगा।
हाचिको की कहानी
नवंबर १९२३ में ओडेट शहर में जन्मा हाचिको मशहूर राजसी अकिता नस्ल का पालतू कुत्ता था, जिसे टोक्यो विश्वविद्यालय में कृषि विज्ञान के प्रोफेसर हिदेसाबुरो उएनो ने अपने बच्चे की तरह ही लाड़- प्यार से पाला-पोसा था। १९२४ में यह पिल्ला ही था, जब प्रोफेसर उसे घर ले आए थे। हर वक्त साथ रहते दोनों एक दिल, एक जान बन गए थे। हाचिको हर सुबह प्रोफेसर को विश्वविद्यालय जाते समय शिबुया स्टेशन पर छोड़ने जाया करता था और शाम को वापस लेने।
प्रोफेसर साहब को सेरेब्रल रक्तस्राव की बीमारी थी। १९२५ में एक दिन क्लास में लेक्चर देते हुए अचानक उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ और वे चल बसे। बेचारा हाचिको वैâसे जान पाता कि उसका मालिक अब वापस नहीं लौटनेवाला। स्वामी की संगत में मस्तमौला और खिलंदड़ा यह कुत्ता उसके वियोग में बिल्कुल उदास और गुमसुम हो गया। उसने खाना-पीना छोड़ दिया। अब उसका बस एक ही काम था- बेचैन होकर चक्कर मारना, रोना और इंतजार करना। मालिक नहीं रहे, लाचार हाचिको को अब दूसरों के पास रहने के लिए भेजा गया, लेकिन उसे चैन कहां, भाग-भागकर वह बार-बार वह शिबुआ स्टेशन आ जाता और एकटक प्रोफेसर के आने की राह ताकता। यह क्रम अगले नौ साल, नौ महीने और नौ दिन तक चलता रहा।
हर शाम देखता था मालिक की राह
सर्दी-गर्मी हो या बारिश का मौसम, हाचिको हर सुबह और हर शाम उम्मीद भरी आंखों से प्रोफेसर के लौटने के शाम के नियत वक्त उन्हें लेने स्टेशन के सामने आता, टकटकी लगाए बेसब्री से इंतजार करता और आंखों में आंसू लिए मायूस होकर लौट जाता। स्टेशन कर्मचारियों ने पहले तो उसे हटाने के प्रयास किए, लेकिन सफल नहीं हो सके। हाचिको के दुख ने अंतत: उन्हें पिघला दिया। अब वे उसे खाना खिलाने और देखभाल करने लगे। १९३२ में टोक्यो के सबसे प्रमुख अखबार ‘आसाही शिंबुन’ में दिल छू लेनेवाली उसकाr कहानी छपी और हाचिको रातों-रात सारे जापान में मशहूर हो गया। १९३४ में वह दिन भी आया, जब कृतज्ञ नागरिकों ने शिबुया स्टेशन के बाहर उसकी कांस्य प्रतिमा स्थापित कर दी। इस समारोह की सबसे बड़ी शान बना हाचिको खुद। शिबुया स्टेशन के बाहर हाचिको की जो प्रतिमा मौजूद है, वह मूल प्रतिमा नहीं है। द्वितीय विश्वयुद्ध में क्षतिग्रस्त होने के बाद १९४८ में उसे दोबारा बनाया गया है।
…और दुनिया को कह दिया अलविदा
दस वर्ष के संत्रास के बाद मार्च, १९३५ के एक दिन हाचिको दुनियाभर को कचोटने वाले अपने लंबे विरह से मुक्ति पाकर दुनिया को अलविदा कह गया। इस अनुपम स्वामिभक्त श्वान की मृत्यु पर विश्वभर में भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा। शोक-सभाएं हुईं और अखबारों में उस पर लेख छापे गए। उसकी अस्थियां शहर की औयमा सिमेट्री में दफनाई गईं, अपने स्वामी के ठीक बगल में। शिबुआ रेलवे स्टेशन आज हाचिको का जीता-जागता स्मारक है। प्रतिमा ही नहीं, स्टेशन के दीवारों पर भी उसका विशाल सुंदर मोजेक आर्ट वर्क मौजूद है। स्टेशन के उस निकास द्वार, जो इस मूर्ति की ओर निकलता है का नाम भी उसके ही नाम पर रखा गया है। टोक्यो यूनिवर्सिटी, जहां प्रो. हिदेसाबुरो पढ़ाते थे, में उनके साथ हाचिको की भी प्रतिमा है। बीते वर्ष ही जापान ने उसकी जन्म शताब्दी मनाई है। यह श्वान सौ साल बाद, आज भी उत्कट स्वामिभक्ति और अटूट समर्पण का प्रतीक बना हुआ है।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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