मुख्यपृष्ठस्तंभपूर्वांचल पॉलिटिक्स  : यूपी में फिर चलेगी जाति की चौसर!

पूर्वांचल पॉलिटिक्स  : यूपी में फिर चलेगी जाति की चौसर!

हिमांशु राज

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव २०२७ अब सियासी दलों के लिए जातिगत समीकरणों की सबसे कठिन परीक्षा बन चुका है। भाजपा, समाजवादी पार्टी, बसपा और कांग्रेस ने अपनी रणनीतियां इसी आधार पर बनानी शुरू कर दी हैं, जहां दलित, पिछड़ा, मुस्लिम तथा ऊंची जातियों का वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाएगा। लोकसभा चुनाव २०२४ के अनुभव से सबक लेते हुए सभी दल सूक्ष्म सामाजिक इंजीनियरिंग पर जोर दे रहे हैं, क्योंकि यूपी की ४०३ सीटों पर जीत जातीय ध्रुवीकरण ही तय करेगा।
भाजपा ने दलित वोटरों को मजबूत करने हेतु बाबा साहेब आंबेडकर से संत रविदास तक १५ दलित महापुरुषों का वार्षिक वैâलेंडर तैयार किया है, जिसके बहाने जयंती-पूण्यतिथियों पर निरंतर जनसंपर्क स्थापित हो रहा। पूर्वांचल के २४ जिलों में चार प्रतिशत राजभर आबादी को लक्ष्य बनाते हुए ओपी राजभर को एनडीए ने प्रमुखता दी है, जबकि सीएम योगी नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम पर महिला पदयात्राओं से पिछड़ों को एकजुट कर रहे है। दूसरी ओर, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) रणनीति को पुख्ता करने हेतु महिला सभा में सीमा राजभर को अध्यक्ष नियुक्त किया, जो भाजपा को सीधी चुनौती है। साथ ही ४०३ सीटों पर विस्तृत जातिगत सर्वे कर टिकट वितरण का नया फॉर्मूला तैयार हो रहा, जहां प्रत्येक क्षेत्र में प्रभावी जाति के मजबूत दावेदार उतारे जाएंगे। कांग्रेस के साथ गठबंधन में विधानसभा-वार जाति प्रभाव का ब्लूप्रिंट साझा हो चुका है।
हालिया ओपिनियन पोल्स में `इंडिया’ गठबंधन को २०६ तथा एनडीए को १७६ सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया, जो गहरे जातीय ध्रुवीकरण की ओर इशारा करता है। बेरोजगारी, महंगाई, विकास जैसे मुद्दे भले उठें, किंतु यूपी की सियासत परंपरागत रूप से जाति पर ही टिक जाती है। भाजपा मतदाता सूची की एसआईआर समीक्षा पर अड़ी हुई तो विपक्ष पिछड़ों-दलितों के अपमान का आरोप लगाता रहता। बसपा मायावती के नेतृत्व में दलित वोट पुन: एकत्रित करने को आतुर है। विशेषज्ञों के अनुसार, २०२७ का यह चुनावी महाभारत जातीय समीकरण पर ही केंद्रीत रहेगा, जहां माइक्रो-रणनीति और स्थानीय समीकरण विजेता तय करेंगे। कुल मिलाकर यूपी की राजनीति जाति की चौसर पर ही चलेगी।

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