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फलसफा : खामोशी

सना खान

हर इंसान अपने दर्द को रोकर नहीं दिखाता। कुछ लोग चीखते नहीं बस धीरे-धीरे खामोश हो जाते हैं। और सच तो यह है कि सबसे ज्यादा खतरनाक वही दर्द होता है, जो आवाज नहीं करता। कभी आपने महसूस किया होगा कि कुछ लोग अचानक बदल जाते हैं। पहले की तरह बातें नहीं करते। हर बात पर मुस्कुराने वाले लोग अचानक चुप रहने लगते हैं। लोगों के बीच रहकर भी कहीं खोए हुए लगते हैं। दुनिया इसे रवैया समझ लेती है। लेकिन कई बार वो बदलाव नहीं, थकान होती है। एक ऐसी मानसिक थकान जिसे इंसान शब्दों में समझा भी नहीं पाता। कुछ लोग इतना कुछ अकेले सह लेते हैं कि एक समय के बाद उन्हें यह लगने लगता है कि उनका दर्द किसी के लिए मायने ही नहीं रखता। फिर वो बोलना कम कर देते हैं। अपनी तकलीफ छुपाना सीख जाते हैं। और हर सवाल पर सिर्फ ‘मैं ठीक हूं’ कहना शुरू कर देते हैं। लेकिन कई बार ‘मैं ठीक हूं’ दुनिया का सबसे झूठा वाक्य होता है। क्योंकि कुछ लोग दर्द बताना नहीं जानते। उन्हें बचपन से सिखाया गया होता है- ‘मजबूत बनो’ ‘रोना बंद करो’ ‘इतना मत सोचो’ और फिर वही लोग धीरे-धीरे अपनी भावनाओं को दबाना सीख जाते हैं। वो बाहर से सामान्य दिखते हैं, काम पर जाते हैं, लोगों से मिलते हैं, हंसते भी हैं लेकिन रात की खामोशी में वो अपने ही मन से हार रहे होते हैं। सबसे दुखद बात यह है कि बहुत बार लोग उनकी खामोशी को घमंड समझ लेते हैं। जबकि सच यह होता है कि वो इंसान बस अंदर से बहुत थक चुका होता है। कुछ लोग मदद मांगना इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि जब उन्होंने पहली बार अपना दर्द बताया था तब किसी ने उसे समझा नहीं था। उस दिन के बाद वो चुप हो गए। और फिर उनकी खामोशी धीरे-धीरे उनकी आदत बन गई। इसलिए अगर आपकी जिंदगी में कोई ऐसा इंसान है, जो अचानक बहुत शांत हो गया है, जो लोगों से दूर रहने लगा है, जो हर बात पर ‘कुछ नहीं’ कह देता है तो सिर्फ उसके शब्द मत सुनिए। उसकी खामोशी को भी समझिए क्योंकि कई लोग आंसुओं से नहीं अपनी खामोशी से मदद मांगते हैं। (हर मानसिक स्थिति ‘पागलपन’ नहीं होती। कई बार इंसान सिर्फ मानसिक रूप से थका हुआ, टूटा हुआ या बेहद अकेला होता है। इसलिए मानसिक संघर्ष को मजाक नहीं, समझ और सहारे की जरूरत होती है।)

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