धारा ६१, ६२ और ६३
एड. कनई बिस्वास
सरकारी कर्मचारी (लोक सेवक) समाज और कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए काम करते हैं। लेकिन क्या होता है जब कोई व्यक्ति उनके काम में बाधा डालता है या आदेश मानने से इनकार करता है?
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), २०२३ की धारा ६१, ६२ और ६३ ऐसे ही मामलों को कवर करती हैं, जहां लोक सेवकों के कार्य में बाधा, अवज्ञा और विरोध अपराध बन जाते हैं।
केस स्टडी- १: ‘सरकारी काम में बाधा’ (धारा ६१- सरकारी काम में बाधा)
एक पुलिस अधिकारी ट्रैफिक नियंत्रित कर रहा था। एक व्यक्ति ने जानबूझकर उसकी बात नहीं मानी और रास्ता रोककर बहस करने लगा।
अदालत क्या देखेगी?
क्या सरकारी काम में बाधा डाली गई?
क्या यह जानबूझकर किया गया?
पैâसला: यह लोक सेवक के कार्य में बाधा डालना है और अपराध है। समझें: धारा ६१ के तहत, किसी लोक सेवक को उसके कर्तव्य निभाने से रोकना अपराध है।
केस स्टडी- २: ‘आदेश का उल्लंघन’ (धारा ६२- आदेश का उल्लंघन)
प्रशासन ने किसी क्षेत्र में धारा लागू कर दी (जैसे कर्फ्यू), लेकिन एक व्यक्ति ने जानबूझकर उस आदेश का उल्लंघन किया।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आदेश वैध था?
क्या व्यक्ति ने जानबूझकर उल्लंघन किया?
पैâसला: यह सरकारी आदेश की अवज्ञा है। समझें: धारा ६२ के अनुसार, लोक सेवक द्वारा जारी वैध आदेश का पालन न करना अपराध है।
केस स्टडी – ३: ‘विरोध या अपराध?’ (धारा ६३- विरोध या अपराध)
एक व्यक्ति को पुलिस ने गिरफ्तार करने की कोशिश की, लेकिन उसने जोर-जबर्दस्ती कर पुलिस से झगड़ा किया और गिरफ्तारी से बचने की कोशिश की।
अदालत क्या देखेगी?
क्या उसने गिरफ्तारी में बाधा डाली?
क्या उसने बल प्रयोग किया?
फैसला: यह लोक सेवक का विरोध और अपराध है। समझें: धारा ६३ के तहत, सरकारी कार्यवाही का विरोध करना या उसमें बाधा डालना अपराध है।
भारतीय न्याय संहिता यह स्पष्ट करती है कि कानून व्यवस्था बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है, सरकारी आदेश का पालन करना अनिवार्य है और लोक सेवकों के काम में बाधा डालना गंभीर अपराध है। यानी, आपका अधिकार तभी तक है जब तक वह कानून के खिलाफ न हो।
(अगले अंक में: धारा ६४, ६५ और ६६ – ‘हिंसा, हमला और सार्वजनिक सुरक्षा’ को आसान उदाहरणों के साथ समझेंगे।)
