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विजय-विमर्श : शिक्षा के भ्रष्ट गठजोड़ ने मेरिट व्यवस्था को खोखला कर दिया

विजयशंकर चतुर्वेदी

लगता है कि भारत में युवाओं की प्रतिभा का मूल्यांकन उनकी मेहनत और योग्यता से नहीं, सिस्टम के भीतर बैठे भ्रष्ट नेटवर्कों की ताकत से होने लगा है। भारत की परीक्षा प्रणाली आज केवल अव्यवस्थित नहीं, बल्कि व्यापक अविश्वास के दौर में प्रवेश कर चुकी है। कोचिंग कार्टेल, प्रिंटिंग प्रेस, डिजिटल नेटवर्क और प्रशासनिक/राजनीतिक संरक्षण का गठजोड़ निर्भीक होकर काम कर रहा है। मामला केवल कुछ परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं या पेपर लीक भर का नहीं रह गया; यह उस राष्ट्रीय भरोसे के विघटन की कहानी है, जिस पर किसी भी लोकतांत्रिक और आधुनिक राष्ट्र की नींव टिकी होती है।
जब कोई छात्र वर्षों की मेहनत, परिवार की आर्थिक कुर्बानियों और मानसिक संघर्ष के बाद परीक्षा हॉल में बैठता है तो वह केवल प्रश्नपत्र नहीं हल कर रहा होता, इस देश की संस्थाओं पर विश्वास भी व्यक्त कर रहा होता है। दुर्भाग्य यह है कि आज वही विश्वास सबसे अधिक टूटा हुआ दिखाई देता है। यही कारण है कि एनटीए जैसे परीक्षा प्राधिकरणों से छात्रों का भरोसा उठता जा रहा है।
कट-ऑफ नहीं, प्रशासनिक विफलता का दस्तावेज
पिछले वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणामों ने जिस प्रकार के प्रश्न खड़े किए हैं, वे सामान्य नहीं हैं। नीट-यूजी परीक्षा में अभी सामने आई अनियमितताओं से लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस एसआई भर्ती परीक्षा की अप्रत्याशित कट-ऑफ तक, यही संकेत मिलता है कि परीक्षा प्रणाली के भीतर गहरे स्तर पर कुछ सड़ चुका है। ४०० अंकों की परीक्षा में सामान्य वर्ग की कट-ऑफ ३६९.८७ तक पहुंच जाना केवल एक संख्या नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है। १६० प्रश्नों में से लगभग १४७ प्रश्नों का सही होना किसी सामान्य प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा की स्वाभाविक स्थिति नहीं मानी जा सकती।
यहां सवाल केवल कुछ छात्रों के चयन या असफलता का नहीं है। सवाल उन लाखों परिवारों का है जिन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए खेती की जमीन तक बेच दी, कर्ज लिया, अपनी जरूरतें टाल दीं, और अंत में पाया कि प्रतियोगिता पहले से ही संदिग्ध थी। यदि परीक्षा का परिणाम संगठित नेटवर्कों और लीक सिस्टम से प्रभावित होने लगे तो फिर मेहनत और ईमानदारी का सामाजिक मूल्य ही समाप्त हो जाता है।
पेपर लीक दुर्घटना नहीं,
संगठित उद्योग
देश के विभिन्न हिस्सों में पिछले वर्षों में सामने आए घोटालों को यदि एक साथ रखकर देखा जाए तो तस्वीर बेहद भयावह दिखाई देती है। NEET-UG, UGC-NET, SSC CGL, AIIMS प्रवेश परीक्षा, यूपी पुलिस कांस्टेबल भर्ती, RO/ARO, BPSC, UKSSSC और व्यापमं जैसे मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पेपर लीक अब कोई आकस्मिक प्रशासनिक त्रुटि नहीं रह गया है। यह एक समानांतर संगठित उद्योग का रूप ले चुका है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि जब छात्र या सामाजिक कार्यकर्ता इन अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तब सत्ता और प्रशासन का बड़ा हिस्सा समस्या के समाधान की जगह विरोध को नियंत्रित करने में अधिक सक्रिय दिखाई देता है। युवाओं पर लाठियां भांजना आसान है, लेकिन परीक्षा माफिया की आर्थिक और राजनीतिक जड़ों तक पहुंचना व्यवस्था की प्राथमिकता नहीं लगता।
स्कूली शिक्षा तक फैली जड़ें
यह संकट केवल उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें स्कूली शिक्षा तक पैâली हुई हैं। आज बोर्ड परीक्षाओं में १०० प्रतिशत अंक सामान्य घटना की तरह प्रस्तुत किए जा रहे हैं। भाषा, साहित्य और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों में पूर्णांक प्राप्त करना अकादमिक रूप से असाधारण होना चाहिए, लेकिन अब यह संस्थागत ब्रांडिंग का हिस्सा बनता जा रहा है।
निजी स्कूलों और शिक्षा बाजार ने एजूकेशन को सीखने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि ‘परफॉर्मेंस पैकेज’ में बदल दिया है। स्कूल अपनी छवि चमकाने के लिए रिजल्ट का उपयोग करते हैं, अभिभावक सामाजिक दबाव में महंगी फीस चुकाते हैं और छात्र लगातार एक कृत्रिम प्रतिस्पर्धा में धकेले जाते हैं। इस प्रक्रिया में वास्तविक प्रतिभा और मौलिक सोच हाशिए पर चली जाती है।
नर्सरी से ही आर्थिक शोषण शुरू
शिक्षा का बाजारीकरण अब इतने आक्रामक रूप में सामने आ चुका है कि नर्सरी स्तर पर ही अभिभावकों का आर्थिक दोहन शुरू हो जाता है। हर वर्ष ‘री-एडमिशन फीस’ के नाम पर वसूली, मनमानी वार्षिक शुल्क वृद्धि और कृत्रिम प्रतिष्ठा आधारित शिक्षा मॉडल ने मध्यमवर्गीय परिवारों को गहरे आर्थिक दबाव में डाल दिया है।
यह विडंबना ही है कि जिन बच्चों को प्रारंभिक स्तर पर केवल बुनियादी, सामाजिक और संज्ञानात्मक कौशल सिखाए जाने चाहिए, उनकी शिक्षा को भी लाखों रुपए के उपभोक्तावादी मॉडल में बदल दिया गया है। शिक्षा अब अधिकार कम और स्टेटस सिंबल अधिक दिखाई देने लगी है।
कानून सख्त, व्यवस्था निष्प्राण
सरकारें समय-समय पर सख्त एंटी-पेपर लीक कानूनों और कठोर दंड की घोषणाएं करती रही हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि हर नई परीक्षा के साथ वही भय, वही संदेह और वही अविश्वास दोबारा लौट आता है। यदि इतने कानूनों के बावजूद प्रश्नपत्र लगातार ल्ाीक हो रहे हैं तो समस्या कानून की नहीं, बल्कि व्यवस्था की नीयत और जवाबदेही में निहित है।
तकनीकी निगरानी, डिजिटल ट्रैकिंग, पारदर्शी मूल्यांकन और स्वतंत्र ऑडिट जैसी व्यवस्थाओं के बिना केवल दंडात्मक प्रावधान इस संकट का समाधान नहीं कर सकते। जब तक परीक्षा प्रणाली को राजनीतिक और आर्थिक प्रभावों से मुक्त कर वास्तविक संस्थागत स्वायत्तता नहीं दी जाएगी, तब तक यह संकट और गहरा होता जाएगा।
शिक्षा का नहीं, राष्ट्र के भविष्य का संकट
किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा प्रतिभा होती है। यदि वही प्रतिभा लगातार अवसाद, भ्रष्टाचार, अनिश्चितता और अविश्वास के बीच जीने को मजबूर हो जाए तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र के क्षरण का संकेत है। अगर मेहनत और ईमानदारी का सामाजिक मूल्य इसी तरह कम होता गया तो दीर्घकाल में न तथाकथित आर्थिक विकास टिकेगा, न सामाजिक सद्भाव।
भारत का युवा आज केवल नौकरी के लिए संघर्ष नहीं कर रहा, वह इस व्यवस्था से पूछ भी रहा है कि क्या उसकी मेहनत का कोई मूल्य बचा है?
यदि इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर व्यवस्था नहीं दे सकी तो आनेवाले वर्षों में सबसे बड़ा नुकसान केवल रोजगार का नहीं, राष्ट्र के नैतिक और सामाजिक विश्वास का होगा, क्योंकि जिस देश के युवाओं को यह लगने लगे कि उनकी मेहनत से अधिक कीमत ‘सिस्टम’ वाली पहुंच की है, वहां केवल परीक्षाएं नहीं फेल होतीं, लोकतंत्र का आधार भी खिसकने लगता है।

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