रमन
भारतीय इतिहास के दो सबसे बड़े व्यक्तित्व महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर। एक ‘राष्ट्रपिता’ तो दूसरे ‘विश्वकवि’। इनके बीच का संवाद अक्सर गंभीर होता था, लेकिन कभी-कभी इसमें गजब का ह्यूमर यानी विनोद भी झलकता था।
६ मार्च १९१५ को शांति निकेतन में जब ये दोनों महामानव पहली बार मिले तो इतिहास रचा गया।
गांधीजी ने टैगोर को ‘गुरुदेव’ कहकर संबोधित किया। टैगोर ने गांधीजी को ‘महात्मा’ की उपाधि दी। ये उपाधियां हमेशा के लिए उनकी पहचान बन गईं।
१९४१ का वो ऐतिहासिक टेलीग्राम
बात १९४१ की है, जब गुरुदेव अपने जीवन के ८०वें वर्ष में थे। सेवाग्राम से बापू का एक छोटा लेकिन गहरा संदेश पहुंचा-
‘Four score not enough. May you finish five. Love.’
(अस्सी साल काफी नहीं हैं। ईश्वर करे आप सौ साल (५ एम्दrा) पूरे करें। सप्रेम।)
गुरुदेव का हाजिरजवाबी उत्तर
टैगोर अपनी बीमारी और बढ़ती उम्र के बावजूद अपनी ‘विट’ (हाजिरजवाबी) नहीं भूले थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया:
‘Thanks message but four score is impertinence, five score intolerable.’
(शुभकामना के लिए धन्यवाद, लेकिन अस्सी साल जीना ही एक धृष्टता है; सौ साल तो बिल्कुल असहनीय होंगे!)
विरासत का पावन समर्पण
गुरुदेव के जीवन की सांध्य बेला आर्थिक चिंताओं की छाया में थी। उन्हें चिंता थी कि उनके सपनों का महल, ‘शांति निकेतन’, उनके जाने के बाद धन के अभाव में कहीं बिखर न जाए। फरवरी १९४० में, जब महात्मा गांधी शांति निकेतन आए तो गुरुदेव ने अत्यंत भावुक होकर उन्हें एक पत्र सौंपा। उस पत्र में टैगोर ने अपने हृदय की व्यथा उड़ेलते हुए लिखा कि शांति निकेतन में उनकी जीवनभर की साधना और कमाई लगी है। उन्होंने पूर्ण विश्वास के साथ अपनी इस अनमोल विरासत को गांधीजी के सुरक्षित हाथों में सौंप दिया। यह दो युगपुरुषों के बीच अटूट भरोसे और सांस्कृतिक संरक्षण का एक ऐतिहासिक क्षण था।
