सामना संवाददाता / मुंबई
भारत में महंगाई का दबाव अब सिर्फ रसोई या बाजार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उत्पादन और सप्लाई चेन के स्तर पर भी तेजी से दिखने लगा है। अप्रैल २०२६ में थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर ८.३ प्रतिशत तक पहुंच गई, जो मार्च के ३.८८ प्रतिशत से बहुत बड़ा उछाल है। यह करीब साढ़े तीन साल का उच्च स्तर माना जा रहा है। इस उछाल की सबसे बड़ी वजह ईंधन, बिजली, कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, धातु और विनिर्मित वस्तुओं की कीमतों में तेज वृद्धि है। ईंधन और बिजली श्रेणी में सालाना आधार पर २४.७१ प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई, जबकि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से जुड़े दामों में भारी उछाल ने उद्योगों की लागत बढ़ा दी।
आने वाले महीनों में जीना होगा मुहाल
दाल, तेल, दूध, सब्जी, कपड़ा सबके दाम बढ़ेंगे!
पेट्रोलियम प्रोडक्ट के महंगे होने से देश में महंगाई आना तय है। थोक मूल्य सूचकांक की बढ़ोतरी इसका संकेत है। चिंता की बात यह है कि थोक महंगाई सीधे उपभोक्ता महंगाई नहीं होती, लेकिन इसका असर कुछ समय बाद आम आदमी की जेब पर पड़ता है। कारखाने, ट्रांसपोर्ट, गोदाम, कृषि-उत्पादन और खुदरा कारोबार, हर जगह ईंधन लागत बढ़ती है तो कंपनियां धीरे-धीरे वह बोझ ग्राहकों पर डालती हैं। यानी आज जो झटका थोक बाजार में दिख रहा है, वह आने वाले महीनों में दाल, तेल, दूध, सब्जी, कपड़ा, निर्माण सामग्री और परिवहन किराए तक पहुंच सकता है।
खास बात यह है कि खुदरा महंगाई अभी अपेक्षाकृत नियंत्रित दिख रही है, लेकिन उत्पादक स्तर पर लागत तेजी से चढ़ रही है। यही अंतर आगे चलकर नीति-निर्माताओं के लिए चुनौती बनेगा। अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो सरकार पर पेट्रोल-डीजल कीमतों को लेकर दबाव बढ़ेगा और रिजर्व बैंक के सामने भी ब्याज दरों को लेकर कठिन स्थिति पैदा हो सकती है। तेल केवल वाहन का ईंधन नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था की नसों में दौड़ने वाला खर्च है। जब तेल महंगा होता है तो महंगाई सिर्फ पंप पर नहीं, पैâक्टरी, खेत, दुकान और अंतत: आम आदमी की थाली तक पहुंचती है।
