मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर :  इस विकल्प को क्या नाम दें?

प्रणवाक्षर :  इस विकल्प को क्या नाम दें?

प्रणव प्रियदर्शी

देश के मुख्य न्यायाधीश की एक दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणी ने पिछले दिनों जिस व्यापक प्रतिक्रिया को जन्म दिया, वह निहायत अप्रत्याशित थी। हालांकि, खुद सीजेआई ने बाद में उस टिप्पणी का खंडन किया, लेकिन तीर कमान से छूट चुका था। हंसी-मजाक और व्यंग्यात्मक मीम से शुरू हुआ ट्रेंड तेज होता गया और देखते-देखते कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से एक नई ‘पार्टी’ ही सामने आ गई।
बढ़ता फैनडम
सोशल मीडिया के जरिए बढ़ता इस पार्टी का फैनडम डेढ़ दशक पहले के अन्ना आंदोलन की याद दिलाता है। खुद को पूरी तरह गैर राजनीतिक बताने वालों की अगुआई में शुरू हुआ वह आंदोलन भी तत्कालीन यूपीए सरकार की कमजोरियों और नाकामियों को मुद्दा बनाते हुए ही परवान चढ़ा था। बगैर किसी वैचारिक पृष्ठभूमि और प्रतिबद्धता के तात्कालिक सत्ता विरोधी भावनाओं के सहारे यह आंदोलन तेज होता गया और फिर उसी कथित गैर राजनीतिक नेतृत्व ने न केवल पार्टी बनाकर कर चुनाव लड़ने का फैसला किया, बल्कि पहले दिल्ली और फिर पंजाब में सत्ता भी हासिल कर ली।
वादे और दावे
आम आदमी पार्टी के अब तक के सफर की बात करें तो दिल्ली और पंजाब में अपनी सरकार के कार्यकाल के दौरान इसके अच्छे-बुरे कार्यों पर अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन इतना तो यकीन के साथ कहा जा सकता है कि आंदोलन के शुरुआती दौर में इसने जो वादे और दावे किए थे, राजनीति की जो कसौटियां तय की थीं, उन पर खरा उतरने में यह अपेक्षित तौर पर उतनी कामयाब नहीं रही।
नवोदित ट्रेंड
बहरहाल, बात कॉकरोच जनता पार्टी नाम के इस नए ट्रेंड की हो रही है। इसकी उत्पत्ति की जड़ में भी मौजूदा सत्ता का जनविरोधी रुख और उस रुख की वजह से आने वाली नीतियां, घोषणाएं और टिप्पणियां ही हैं। इसमें भी दो राय नहीं कि इस पार्टी की बातों में देश के आम लोगों की भावनाएं झलक रही हैं। फिर भी, यह सवाल बनता है कि इस नवोदित ट्रेंड को कितनी गंभीरता से लिया जाना चाहिए, इसमें कितनी संभावनाएं देखी जानी चाहिए।
पार्टियों की साख
जवाब मूलत: इस बात पर निर्भर करता है कि देशवासियों का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया से शुरू हुए इस ट्रेंड को कितना विश्वसनीय मानता है। जहां तक आम लोगों के भरोसे की बात है तो उसमें एक अहम पैâक्टर यह भी होता है कि मौजूदा राजनीतिक दलों को लेकर आम लोगों की वैâसी सोच है। यानी सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों की आम लोगों के बीच कितनी और वैâसी साख है।
स्वयंभू लोकप्रिय प्रधानमंत्री
पिछला लगभग पूरा दशक इस लिहाज से अहम माना जा सकता है कि इस दौर में देश को नरेंद्र मोदी के रूप में एक ऐसा प्रधानमंत्री हासिल रहा, जिसकी लोकप्रियता के गीत देश-विदेश में गवाए जाते रहे। इसके साथ ही, विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेता के रूप में राहुल गांधी की छवि लगातार सवालों के घेरे में उछाली जाती रही। इसके पीछे चाहे जो भी कारक रहे हों, लेकिन यह सच है कि इस अवधि में देश जहां अपने कथित कामयाब प्रधानमंत्री के सौ खून माफ करने की मुद्रा में रहा, वहीं नेता प्रतिपक्ष को संभावित विकल्प का दर्जा देना भी उसके लिए मुश्किल दिखता रहा।
राहुल की बढ़ती विश्वसनीयता
यह स्थिति कितनी वास्तविक थी और कितनी बनावटी, यह एक अलग सवाल है। लेकिन उससे इतर, आज की सच्चाई यह है कि वह स्थिति पूरी तरह से पलटती दिख रही है। जहां प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार नीचे जा रहा है, वहीं नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की विश्वसनीयता बढ़ती जा रही है। आलम यह है कि २०२४ के लोकसभा चुनावों में झटका खाने के बाद राज्य विधानसभा चुनावों में जीत का रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाकर भी बीजेपी पीएम की लोकप्रियता का यकीन नहीं दिला पा रही।
शून्य की स्थिति
कुल मिलाकर, एक शून्य की स्थिति फिर भी दिखती है। मौजूदा सरकार से मोहभंग जिस तेजी से हुआ है, उस गति से विपक्षी दलों की लोकप्रियता नहीं बढ़ी है। लिहाजा, आम लोगों का, खासकर मध्यवर्गीय युवाओं का एक बड़ा हिस्सा खुद को दिशाहीनता की स्थिति में पा रहा है। ऐसे हालात कॉकरोच जनता पार्टी जैसे तात्कालिक और जड़ विहीन विकल्पों के लिए संभावना पैदा कर देते हैं।
बादलों की आकृतियां
मगर ऐसे विकल्प देश और समाज को सही दिशा नहीं दे पाते। अपने समय की समस्याओं और चुनौतियों का ठोस हल नहीं पेश कर पाते। ये विकल्प हवा के सहारे आसमान में बनती बादलों की आकृतियों जैसे होते हैं। हवा का रुख बदलते ही ये तस्वीरें भी बदलने लगती हैं। इससे भी बड़ा मसला इनके साथ यह होता है कि इनके पीछे किस तरह की शक्तियां छुपी होती हैं, इसका अंदाजा लगाना बड़ा मुश्किल होता है।
दोहरी चुनौती
इसलिए विपक्षी राजनीतिक ताकतों के सामने दोहरी चुनौती है। इन्हें मौजूदा सत्ता की जनविरोधी नीतियों का विरोध तो करना ही है, इनके विरोध के नाम पर हो रही अदृश्य ताकतों की जुटान को भी नाकाम करना है।

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