भीषण नाजुक समय से
विश्व गुज़र रहा है,
विकसित देशों का स्वार्थ
खुलकर सामने आ गया।
दादागिरी इनकी बढ़ती जा रही,
लोभ-लिप्सा अब छुपी न रह सकी।
विकसित देश खेल घिनौने खेल रहे,
विकासशील देशों की
मुसीबतें बढ़ा रहे।
शक्ति और साधन परमाणु ऊर्जा में
खपा रहे,
परमाणु बमों की संख्या से
निर्बल देशों को डरा रहे।
आगे रहने की दौड़ में
देश एक-दूसरे को धकिया रहे,
कोई खुलकर तो कोई
आड़ में रहकर
अपना प्रभुत्व जमा रहे।
शीत युद्ध का समय समाप्त हो गया,
पड़ोसी से पड़ोसी राष्ट्र
आतंकवाद से भिड़ रहा।
प्राकृतिक संसाधनों, मानव ज्ञान का
मानवता के विनाश में
उपयोग हो रहा।
विनाशक अस्त्र-शस्त्रों के निर्माता
अपने लिए बाजार खोज रहे,
एक देश को दूसरे देश का
प्रतियोगी बना रहे।
प्रयोगशालाओं में नित नए
विनाशक रोगों के
कीटाणु खोज रहे।
धरा संभल नहीं रही,
ग्रहों में बस्तियां बसाने चले हैं,
भविष्य के युद्ध की
पटकथा अभी से लिख रहे हैं।
देशों में भूख, पीड़ा, गरीबी से
मरते लोगों से आंखें मूंद रहे,
कुछ देश बूंद-बूंद पानी को तरस रहे।
विश्व बाजार में छाने की
दौड़ लगा रहे।
विश्व ‘डीप सोर्स’ से शासित है अब,
इसके त्रिकोण की तीन भुजाएं—
नशा, अस्त्र और औषध।
तरस खाओ,
त्रस्त मानवता बचाओ।
विनाश नहीं,
बीमारी मिटाओ।
छद्म नीतियां छोड़ो अब,
उत्थान की गति बढ़ाओ।
-बेला विरदी
