पत्थर होते गांव अब, हर पल करे पुकार।
लौटा दो फिर से मुझे, खपरैल्ला आकार।।
पीपल वाली छांव थी, मीठे थे संवाद।
अब चौपालें मौन हैं, होते वाद-विवाद।।
सीमेंटों के जंगल में, खोया घर-परिवार—
लौटा दो फिर से मुझे, खपरैल्ला आकार।।
कच्चे आँगन, नीम की, ठंडी-ठंडी छांव।
हुक्का, किस्से, गीत थे, जीवित पूरा गांव।
अब मोबाइल में सिमट, मरते सब व्यवहार—
लौटा दो फिर से मुझे, खपरैल्ला आकार।।
बैलों वाली चाल थी, मिट्टी की पहचान।
बरखा आते ही महक, उठता था खलिहान।
अब तो सूनी हो गई, खेतों की झंकार—
लौटा दो फिर से मुझे, खपरैल्ला आकार।।
नदिया, पोखर, बावड़ी, सब होते लाचार।
कटते पेड़ों ने किया, प्रकृति पर प्रहार।
प्यासे पंछी पूछते, कहाँ गया वह प्यार—
लौटा दो फिर से मुझे, खपरैल्ला आकार।।
‘सौरभ’ गांवों में बसा, भारत का सम्मान।
माटी की खुशबू बिना, सूना हिंदुस्थान।
अपनी जड़ों से जुड़ो, समझो ये संस्कार—
लौटा दो फिर से मुझे, खपरैल्ला आकार।।
-डॉ. सत्यवान सौरभ
