डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी / जौनपुर
उत्तर प्रदेश में नशे का जाल अब शहरों से निकलकर गांव की चौपालों तक फैल गया है। हर तीसरे-चौथे गांव में खुलेआम गांजा बिक रहा है। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि इसके पीछे पुलिस का संरक्षण है।
किराने पर ‘टॉफी’ की तरह गांजा
गांव वालों के मुताबिक, शाम ढलते ही खेतों, तालाबों और सुनसान स्कूलों के पास नशेड़ियों की भीड़ जुट जाती है। किराने की दुकानों पर गांजे की पुड़िया टॉफी की तरह मिलती है। पुलिस को सब पता है, पर कार्रवाई सिर्फ दिखावे की होती है। महीने-दो महीने में एक बार छापा पड़ता है, वह भी ऊपर से दबाव आने पर। 10 पुड़िया पकड़कर 100 पुड़िया का धंधा चलने दिया जाता है।
थाने का ‘मंथली सिस्टम’
नाम न छापने की शर्त पर ग्रामीण बताते हैं कि हर थाने का रेट तय है। छोटे तस्करों से 2 से 5 हजार और बड़े सप्लायरों से 20 से 50 हजार रुपये महीने की ‘मंथली’ बंधी है। पैसा पहुंचते ही पुलिस की गाड़ी गांव के बाहर से लौट जाती है। जो नहीं देता, उसी का नाम तस्करों की सूची में चढ़ जाता है। पुलिस अब रोकने वाली नहीं, बल्कि हिस्सेदार बन चुकी है।
बर्बाद हो रही जवानी
आसान उपलब्धता ने 14 से 25 साल के युवाओं को जकड़ लिया है। स्कूल छोड़ने वालों की संख्या बढ़ रही है। मजदूर अपनी दिहाड़ी का आधा हिस्सा नशे में उड़ा रहे हैं। घरों में कलह, चोरी और मारपीट रोज की हो गई है।
टास्क फोर्स बनी, नतीजा टांय-टांय फिस्स
सरकार ने एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स बनाई, ड्रोन से निगरानी के दावे किए, पर जमीन पर असर शून्य है। एसपी बदलते हैं, मगर ‘हफ्ता सिस्टम’ जस का तस बना हुआ है। सवाल कानून का नहीं, बल्कि पुलिस की नीयत का है।
जवाबदेही तय हो
जब तक बीट सिपाही और थानेदार की सीधी जवाबदेही नहीं होगी, तब तक अभियान बेकार साबित होंगे। हर महीने ग्राम प्रधान के सामने थानेदार को जवाब देना पड़े। वसूली में पकड़े जाने पर सीधी बर्खास्तगी हो।
गांव देश की आत्मा हैं। अगर आत्मा को ही नशे ने जकड़ लिया, तो ‘नशा मुक्त यूपी’ का नारा खोखला साबित होगा। भाषणों से पहले थानों को ‘वसूली मुक्त’ करना होगा, वरना आने वाली पीढ़ी माफ नहीं करेगी।
