मुख्यपृष्ठस्तंभसाड़ी के पल्लू में छिपती खांसी!..मुंबई की टीबी राजधानी में कमला की...

साड़ी के पल्लू में छिपती खांसी!..मुंबई की टीबी राजधानी में कमला की खामोश जंग

मनमोहन सिंह

सुबह के ठीक साढ़े चार बजे, जब मुंबई के मानखुर्द इलाके में लोकल ट्रेनों की गड़गड़ाहट शुरू होती है, ३२ वर्षीय कमला की आंखें अपने आप खुल जाती हैं। उसकी सुबह की शुरुआत चाय की चुस्कियों से नहीं, बल्कि एक गहरी, छाती को झकझोर देनेवाली खांसी से होती है। कमला इस खांसी को पिछले दो महीने से दबाने की कोशिश कर रही है, ठीक वैसे ही जैसे वह अपने भीतर के डर को दबाती है।
कमला एक घरेलू सहायिका है। उसका पूरा दिन घाटकोपर की ऊंची सोसायटियों में चार अलग-अलग घरों में झाड़ू-पोंछा करने, बर्तन मांजने और कपड़े धोने में बीतता है। दिन के बारह-बारह घंटे लगातार हाड़-तोड़ शारीरिक श्रम करने के बाद जब उसकी पीठ और छाती में तेज दर्द होता है तो वह खुद को बहला लेती है कि दिनभर झुककर काम करने की वजह से बदन टूट रहा है और कुछ नहीं।
कमला जैसी कामकाजी महिलाओं के लिए बीमारी का मतलब सिर्फ शारीरिक दर्द नहीं, बल्कि सीधे तौर पर कमाई का नुकसान है। हाल ही में जब उसकी खांसी और बुखार असहनीय हो गया, तो वह पास के शताब्दी अस्पताल में गई। डॉक्टरों ने शुरुआती जांच के बाद उसे डायरेक्टली ऑब्जर्व्ड ट्रीटमेंट यानी डॉट्स के तहत हफ्ते में चार दिन क्लिनिक आने की सलाह दी। यहीं से कमला की असली परीक्षा शुरू होती है। सरकारी क्लिनिक की लंबी लाइनों में खड़े होने का सीधा मतलब है किसी एक घर के काम से छुट्टी। जिस दिन वह आधे दिन की छुट्टी लेती है, उस दिन की पगार काट ली जाती है। भले ही सरकार की तरफ से दवाएं मुफ्त हैं, लेकिन क्लिनिक आने-जाने का ऑटोरिक्शा का किराया और पोषण के लिए डॉक्टर द्वारा बताई गई खुराक खरीदने में उसकी बरसों की जमा-पूंजी खत्म हो चुकी है। अब उसे पड़ोसियों से पैसे उधार लेने पड़ रहे हैं। कमला की सबसे बड़ी परेशानी उसकी बीमारी से ज्यादा वह सामाजिक डर है जो इस शब्द के साथ आता है। इंडिया टीबी रिपोर्ट के आकड़े उसकी जिंदगी की कड़वी हकीकत हैं। उसे हर पल यह डर सताता है कि अगर उसकी मालकिन को बीमारी का पता चल गया तो उसे तुरंत काम से निकाल दिया जाएगा। घर पर भी स्थिति जुदा नहीं है। खांसी उठते ही वह अपनी साड़ी के पल्लू से मुंह कसकर ढंक लेती है, ताकि बच्चे या पति असहज न हों। मुंबई को भारत की टीबी राजधानी के रूप में भी देखा जाता है। यहां की घनी आबादी, संकरी झोपड़पट्टियां और हवा-उजाले की कमी इस बीमारी को तेजी से पैâलने का मौका देती है। मुंबई आज ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी यानी एमडीआर-टीबी के सबसे बड़े
हॉटस्पॉट में से एक है।

ट्यूबरक्लोसिस एक संक्रामक बीमारी है, जो माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस नाम के बैक्टीरिया के कारण होती है। यह मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है और हवा के जरिए फैलती है। साधारण टीबी का इलाज छह महीने के लगातार एंटीबायोटिक कोर्स से पूरी तरह संभव है, जिसमें इलाज पूरा करने की दर अस्सी से पचासी फीसदी है।
-डॉ. अनिल सिंघल, टीबी स्पेशलिस्ट

अन्य समाचार