-सत्ता के साबुन, गैस के गुब्बारे और जहरीली शराब के जनाजे
राजन पारकर
महाराष्ट्र की राजनीति अब विचारों से नहीं, वीडियो से चलती है। पहले नेता जनता के बीच अपनी छवि बनाने के लिए संघर्ष करते थे, अब एक-दूसरे के कथित वीडियो और फाइलों के भरोसे सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते हैं। आरोप यह है कि किसी के पास किसी का वीडियो है इसलिए किसी को क्लीन चिट मिल रही है। यानी लोकतंत्र अब संविधान से नहीं, ‘पेन ड्राइव पुराण’ से संचालित हो रहा है। राजनीति का हाल ऐसा हो गया है कि जनता को नेता कम और ब्लैकमेलिंग इंडस्ट्री के शेयरधारक ज्यादा दिखाई देने लगे हैं। कल तक जो एक-दूसरे को भ्रष्टाचार का अवतार बताते थे, वे आज उसी ‘वॉशिंग मशीन’ में धुलकर दूध से भी ज्यादा सफेद निकल आते हैं। लगता है देश में सबसे बड़ी वैज्ञानिक खोज कोई अंतरिक्ष यान नहीं, बल्कि वह राजनीतिक वॉशिंग मशीन है जिसमें घोटाले, आरोप और नैतिकता सब एक साथ धुल जाते हैं।
गैस महंगी, जनता सस्ती!
देश में महंगाई का ऐसा दौर है कि अब रसोई का चूल्हा भी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के भरोसे जलता है। हजारों किलोमीटर दूर होनेवाले युद्ध का बिल मुंबई का रिक्शाचालक और मध्यमवर्गीय गृहिणियां भर रही हैं। सीएनजी और पीएनजी के दाम बढ़े हैं। दो रुपए की वृद्धि सुनने में छोटी लग सकती है, लेकिन यह वही दो रुपए हैं, जो सरकार के लिए मामूली और आम आदमी के लिए रोजमर्रा की चिंता बन जाते हैं। जनता की जेब अब ऐसी हो गई है जैसे पुराने जमाने की सरकारी सड़क-हर महीने थोड़ा और खोखली। महंगाई का दर्शन भी बड़ा अद्भुत है। जब दाम बढ़ते हैं तो कहा जाता है कि यह वैश्विक परिस्थिति का परिणाम है। लेकिन जब जनता पूछती है कि राहत कब मिलेगी, तब वैश्विक परिस्थिति अचानक स्थानीय विषय बन जाती है। गैस महंगी, पेट्रोल महंगा, डीजल महंगा, सब्जियां महंगी -केवल आदमी की मेहनत और उसकी मजदूरी ही सस्ती रह गई है।
जहरीली शराब और प्रशासन की नींद
पुणे की जहरीली शराब त्रासदी केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था के चेहरे पर पड़ा हुआ करारा तमाचा है। लोग घर से निकले थे जीवन जीने के लिए, लेकिन लौटे अर्थी बनकर। जिन परिवारों के चूल्हे जलते थे, वहां अब शोक की राख उड़ रही है। सबसे भयावह बात मौत नहीं है, बल्कि वह व्यवस्था है जो मौत के बाद जागती है। जब तक जहर बिकता रहा, सबकुछ सामान्य था। जैसे ही लोग मरने लगे, अचानक प्रशासन को कानून याद आ गया। यह वही पुरानी कहानी है, जिसमें अपराध पहले होता है और कार्रवाई बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस के रूप में जन्म लेती है। स्थानीय महिलाओं के आरोप और भी गंभीर हैं। यदि वास्तव में अवैध धंधों पर कार्रवाई केवल दिखावे की हो और अपराधियों को संरक्षण मिलता हो तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि सामाजिक अपराध है। जनता वर्षों से शिकायत करती है, मगर उसकी आवाज फाइलों के कब्रिस्तान में दफन हो जाती है। ‘यह कैसी व्यवस्था है जहां शराब बेचनेवाला खुला घूमता है, मरनेवाला श्मशान जाता है और जिम्मेदार लोग जांच समिति के पीछे छिप जाते हैं।
