मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव :  गांव, बगीचा और जानवर

काहें बिसरा गांव :  गांव, बगीचा और जानवर

पंकज तिवारी

मितई जमीन पर गिरा पड़ा था। दर्द उसके चेहरे से होते हुए आंखों तक पसर गई थी। साइकिल अब भी उसके उपर ही पड़ी मस्त-मगन थी। उठने के प्रयास में मितई दुबारा और भी अधिक झटकों के साथ बैठ गया था। बैठ क्या बल्कि भहरा ही पड़ा था। कराह सुन कर ददा भी कराह उठे। दौड़कर पांडे को उठाना चाहे पर उठा नहीं सके। उम्र जवाब दे गई। ददा दुबारा फिर से जोर-आजमाइश किए पर प्रतिफल शून्य ही रहा। घबराहट के मारे ददा का दिमाग काम ही नहीं कर पा रहा था। ददा झट से साइकिल उठा कर पीछे की तरफ ढकेल दिए और वहीं से आवाज लगाने लगे- ‘गदेलवउ कवनउ हए रेऽ, दउड़ु जल्दी… हए रे कवनउ..’ ददा जोर-जोर से चिल्लाते रहे पर उधर से कोई भी आवाज नहीं आई। निराश-हताश ददा भी वहीं पांडे के बगल ही बैठ गए। मितई अभी भी दर्द से तड़प ही रहे थे।
‘ददा गलती त हमरइ रहीऽ.. जवन हम तोहार मजा लेत रहे। सही कहा बा ददा कि बिना मतलब केहू के परेशान न करइ के चाहेऽ। जे अइसन करे देर-सवेर ओका जरूर भरइ के पड़े, जइसे आज हम भरत हई ददा’- मितई बोले।
‘चुप करऽ बस.. अइसन न कहै के चाहेऽ। चलऽ एक काम करऽ, फेरि एक बेर प्रयास कर त, का जानइ अबकि दांइ उठि जाऽ..?’- ऐसा कहते हुए ददा फिर से खड़े हो गए और पांडे का हाथ पकड़ कर उठाने लगे। अब तक पांडे मानसिक रूप से भी खुद को मजबूत कर चुके थे। दर्द होने के बावजूद मन को कड़ा करते हुए उठने का प्रयास किए। ददा के सह पर एक ही बार में खड़े हो गए पांडे। ददा उनके हाथ को अपने कंधे पर रखते हुए धीरे-धीरे आगे की तरफ बढ़ाने लगे। उछल कर ही सही पर अब चल पा रहे थे पांडे।
‘चल बचइया एक बात त बाऽ कि बचि गए तंइ। हड्डी पसली सब ठीक-ठाक बाऽ, अंदरुनी चोट नाइ बाऽ, जवन भी बाऽ बस बहरेन से बाऽ। मुस्कुरा उठे पांडे। धीरे-धीरे साइकिल की तरफ बढ़े। ददा उठाकर साइकिल उनके हाथ में पकड़ा दिए। पांडे साइकिल के पास खड़े ददा को निहारने लगे।
‘हेऽ ददा हमइ माफ कइ दिहऽ हो। हमसे बहुत बड़ी गलती होइ गइ। आज के बाद हम कसम खाथई कि हम हमेशा बूढ़ पुरनिया के सेवा अउर सम्मान करब हो ददा। ओइसइ ई बात सौ टका सही बा कि हमै हमेशा अपने से बूढ़-पुरनिया के इज्जत जरूर करै के चाहे’- कहते हुए पांडे साइकिल का हैंडल पकड़ लिए और साइकिल पर सवार हो गए।
‘चला जाब्यऽ न.. ? कवनउ दिक्कत त नाइ बाऽ..? कहऽ त हमहूं चलीऽ..?’
‘नाहि.. नाहि.. हो ददा हम चला जाब। तू परेशान जिनि होऽ। ठीक बा हम चलथई’ कहते हुए पांडे पाइडल चला दिए।
‘ठीक.. ठीक.. घरे पहुंचि के गरम तेल अउर हर्दी जरूर बान्हि लिहऽ बेटवा नाहि त कालि सबेरे बहुत दुख देए ई..’ ‘हां.. हां.. जरूर ददा’
पांडे धीरे-धीरे दूर होते चले गए। इधर ददा की भैंसें लदेरन के खेत में पहुंच कर चभर-चभर माल खाने में लगी हुई थीं। नजर पड़ते ही ददा बौखला गए। घबराहट के मारे उठा कर मार दिए डंडा। बेचारे जानवर क्या समझते इस भाषा को, भागते हुए और बीच में चले गए। देखते ही देखते पूरा खेत दहंज दिया गया। ददा दौड़े, डंडा फिर उठाए और चला दिए। जितने जानवर उतने तरफ भागने लगे। एक अकेले ददा कहां-कहां दौड़ते। बेचारे दौड़ते रहे, हांफने तक दौड़ते रहे। बड़ी मशक्कत के बाद जाकर मामला शांत हुआ।
जानवर अब तक आगे बढ़कर ताल में पहुंच चुके थे और खूब सारी घास पाकर खाने में जुट गए थे। कान्हे पर से लाठी नीचे धरते हुए ददा धम्म से बैठ गए।
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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