मद्रास हाई कोर्ट ने वीआईपी दर्शन पर जो तीखे सवाल उठाए हैं, उन्हें सुनकर लोकतंत्र के ‘परम सेवकों’ के संवेदनशील दिलों पर क्या गुजरी होगी, इसका अंदाजा जज साहब को शायद नहीं है। कोर्ट का यह कहना कि ‘ईश्वर के सामने सब बराबर हैं’, किताबी तौर पर तो ठीक है, लेकिन व्यवहार में यह उन राजनेताओं के साथ सरासर नाइंसाफी है जो चौबीसों घंटे देश और दुनिया को संभालने के बोझ तले दबे जा रहे हैं।
अगर गहराई से देखें, तो नेताओं की इस ‘अथक साधना’ का दर्द साफ समझ आता है। एक नन्ही सी जान पर पूरे राज्य, देश और वैश्विक कूटनीति का भार होता है। उन्हें खुद के रोटी, कपड़ा और मकान की चिंता नहीं होती; वे तो चौबीसों घंटे इस फिक्र में दुबले होते हैं कि जनता के सिर पर छत (चाहे वह झोपड़ी हो या १ बीएचके) और तन पर कपड़ा रहे। अब इस भारी जनसेवा के बदले अगर उनके पास एकड़ों में पैâले बंगले हैं, तो भाई, करोड़ों लोगों का भार संभालने के लिए इतनी जगह तो बनती ही है! ऐसे महापुरुषों को भगवान से मिलने के लिए ‘प्रिविलेज’ और ‘प्रायोरिटी’ क्यों नहीं मिलनी चाहिए? आखिर वे मंदिर अपनी निजी मन्नत मांगने नहीं, बल्कि कतार में खड़ी उसी ‘भोली प्रजा’ के कल्याण की पैरवी करने जाते हैं। अब सोचिए, लाइन में खड़ी जनता तो भगवान के सामने अपनी छोटी-मोटी व्यक्तिगत डिमांड्स की लिस्ट खोल देगी। इससे तो भगवान भी ‘कन्फ्यूज’ हो जाएंगे कि किसकी सुनें और किसकी न सुनें!
गर्भगृह में ‘शॉर्टकट’
प्रजा के माई-बाप यानी हमारे नेताजी का यह फर्ज बनता है कि वे सीधे गर्भगृह में ‘शॉर्टकट’ से घुसें, पूरी जनता की तरफ से एकमुश्त आरजू की दरखास्त ईश्वर के सामने लगाएं और फटाफट देश के विकास में वापस जुट जाएं। अगर नेताजी भी आम आदमी की तरह छह घंटे कतार में लग गए, तब तो देश का विकास ही रुक जाएगा! इस पूरे मामले का लब्बो-लुआब यही है कि जब भी कोई रसूखदार मंदिर पहुंचे, तो प्रजा को बिना चूं-चूं किए उन्हें सीधे आगे जाने देना चाहिए। आखिर नेताजी के आने से मंदिर के ट्रस्ट को भारी दान-दक्षिणा मिलती है और सरकार की दयादृष्टि भी बनी रहती है। वैसे भी, समझदार ट्रस्टी जानते हैं कि भगवान तो दयालु हैं, वे कभी कुछ नहीं बिगाड़ते; लेकिन अगर नेताजी का मूड बिगड़ गया, तो मंदिर के वीआईपी पास से लेकर ट्रस्ट की मान्यता तक, सब कुछ संकट में पड़ सकता है!
