सना खान
नंदिनी ने कभी नहीं सोचा था कि दस साल बाद वह आरव से फिर मिलेगी। एक समय था जब दोनों एक-दूसरे के बिना दिन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। साथ जीने के सपने थे, भविष्य की योजनाएं थीं और एक ऐसा विश्वास था, जिसे वे अटूट समझते थे। लेकिन जिंदगी हमेशा वादों के मुताबिक नहीं चलती। परिस्थितियां बदलीं, प्राथमिकताएं बदलीं और एक दिन आरव उसकी जिंदगी से दूर चला गया। कोई बड़ा झगड़ा नहीं हुआ था, कोई नाटकीय विदाई भी नहीं। बस कुछ पैâसले ऐसे थे, जिन्होंने दो लोगों को अलग रास्तों पर खड़ा कर दिया। नंदिनी ने बहुत इंतजार किया। हर त्योहार, हर जन्मदिन और हर नए साल पर उसे लगता कि शायद इस बार कोई संदेश आएगा। शायद कोई अधूरी बात पूरी होगी। शायद वह लौट आएगा। लेकिन कुछ लोग लौटकर नहीं आते, सिर्फ यादों में रह जाते हैं। समय बीतता गया। नंदिनी ने खुद को संभालना सीख लिया। उसने यह भी सीख लिया कि हर अधूरी कहानी को अंत तक पहुंचाने की जरूरत नहीं होती। फिर एक दिन, वर्षों बाद, एक पुस्तक प्रदर्शनी में उसकी मुलाकात आरव से हो गई। दोनों कुछ क्षणों तक एक-दूसरे को देखते रहे। समय ने बहुत कुछ बदल दिया था, लेकिन कुछ पहचानें कभी नहीं बदलतीं। आरव ने धीमे स्वर में कहा, ‘वैâसी हो?’ ‘अच्छी हूं,’ नंदिनी ने मुस्कुराकर जवाब दिया। कुछ औपचारिक बातों के बाद आरव अचानक गंभीर हो गया। ‘मैंने तुम्हें बहुत दुख दिया था,’ उसने कहा। नंदिनी चुप रही। ‘अगर हो सके तो मुझे माफ कर देना।’ यह वही वाक्य था, जिसे सुनने के लिए उसने कभी अनगिनत रातें जागकर बिताई थीं। लेकिन आज उसके भीतर कोई शिकायत नहीं थी, कोई गुस्सा नहीं था। उसने शांत स्वर में कहा, ‘मैंने तुम्हें बहुत पहले माफ कर दिया था।’ आरव की आंखों में राहत दिखाई दी।
लेकिन नंदिनी ने आगे कहा, ‘माफी मिल जाना और किसी की जिंदगी में वापस वही जगह मिल जाना, दोनों अलग बातें हैं।’ आरव कुछ नहीं बोला। नंदिनी मुस्कुराई और बोली, ‘मैंने तुम्हें इसलिए माफ किया क्योंकि मैं अपने दिल में बोझ लेकर नहीं जीना चाहती थी। लेकिन जो विश्वास एक बार टूट गया था, उसे दोबारा वहीं से शुरू नहीं कर सकती, जहां वह खत्म हुआ था।’ उस पल दोनों समझ गए कि कुछ प्रेम कहानियां माफी तक तो पहुंच जाती हैं, लेकिन दोबारा शुरू नहीं होतीं।
