मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत : रुपए की थकान और भाषणों की चमक

रुख-ए-सियासत : रुपए की थकान और भाषणों की चमक

तौसीफ कुरैशी

देश में एक अजीब समय चल रहा है। बाजार की भाषा कुछ और कह रही है, सत्ता की भाषा कुछ और। रुपया गिर रहा है, लेकिन दावे उठ रहे हैं। जेब हल्की हो रही है, लेकिन मंचों पर आत्मनिर्भरता के नारे भारी होते जा रहे हैं। अब खबर यह है कि रुपया केवल डॉलर के सामने ही नहीं, बल्कि चीनी युआन के मुकाबले भी कमजोर हुआ है। २०२६ में युआन के मुकाबले रुपए में करीब ७ से ८ प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह केवल विदेशी मुद्रा बाजार का तकनीकी उतार-चढ़ाव नहीं है। यह उस घर की चिंता है, जहां मोबाइल बदलना है बच्चे के लिए लैपटॉप खरीदना है या दुकान पर चीन से आने वाले पुर्जों का इंतजार है।
भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। हम खरीद ज्यादा रहे हैं, बेच कम रहे हैं। ऐसे में जब युआन मजबूत होता है और रुपया कमजोर, तब नुकसान केवल आंकड़ों का नहीं होता। उसका हिसाब बाजार के हर रैक पर दिखाई देता है। खिलौने से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान तक, हर चीज की कीमत में धीरे-धीरे आग उतरती है। उधर पश्चिम एशिया में तनाव और तेल की बढ़ती कीमतों ने स्थिति को और कठिन बना दिया है। तेल महंगा होगा तो परिवहन महंगा होगा, परिवहन महंगा होगा तो सब्जी से लेकर सीमेंट तक सब महंगा होगा। अर्थव्यवस्था में महंगाई कभी अकेले नहीं आती, वह अपने साथ कई संकटों की बारात लेकर आती है। हाल के सप्ताहों में कच्चे तेल की कीमतें १०० डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंचने की आशंका से बाजार चिंतित रहा है। सवाल यह नहीं है कि रुपया क्यों गिरा। सवाल यह है कि जनता को सच क्यों नहीं बताया जाता। लोकतंत्र में आर्थिक संकट का इलाज आंकड़ों को छिपाना नहीं, भरोसा पैदा करना होता है। लेकिन जब सरकारें जवाब देने के बजाय जश्न मनाने लगें, तब बाजार अपना पैâसला खुद लिख देता है। रुपए की कमजोरी दरअसल अर्थव्यवस्था की वह चिट्ठी है, जिसे सत्ता पढ़ना नहीं चाहती और जनता फाड़ नहीं सकती।
बाजार की चेतावनी सत्ता की चुप्पी!
किसी भी देश की मुद्रा केवल कागज नहीं होती। वह उस देश की साख होती है, उसके श्रमिक की मेहनत होती है और उसके किसान का पसीना होती है। जब मुद्रा कमजोर होती है तो उसका सबसे बड़ा दर्द उन लोगों तक पहुंचता है, जिनके पास बचाव का कोई साधन नहीं होता। दिल्ली, गाजियाबाद, कानपुर, पटना या भोपाल में बैठा आम आदमी विदेशी मुद्रा बाजार नहीं समझता। उसे केवल इतना समझ आता है कि पहले जो मोबाइल १५ हजार में आता था, वह अब १७ हजार का हो गया। पहले जो पंखा, बैटरी, एलईडी या दवा सस्ती थी, उसकी कीमत अब बढ़ रही है। चीन से आने वाले हजारों उत्पादों की लागत बढ़ने का सीधा असर भारतीय उपभोक्ता पर पड़ना तय है।
विडंबना यह है कि पिछले कई वर्षों से देश को विश्वगुरु बनाने के दावे किए गए। लेकिन अर्थशास्त्र नारों से नहीं चलता। विदेशी निवेश घटे, व्यापार घाटा बढ़े, तेल महंगा हो और मुद्रा पर दबाव बने तो बाजार राष्ट्रवाद नहीं, संतुलन मांगता है। रिजर्व बैंक को भी रुपए को संभालने के लिए लगातार हस्तक्षेप करना पड़ रहा है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव दिखाई दे रहा है। इसका मतलब है कि समस्या केवल बाहरी नहीं है, भीतर भी कुछ गांठें हैं, जिन्हें खोलना होगा। लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल सत्ता से पूछा जाना चाहिए। आज वही सवाल फिर खड़ा है। अगर रुपया गिर रहा है तो जिम्मेदारी किसकी है? अगर आयात महंगा हो रहा है तो उसका बोझ कौन उठाएगा? और अगर जनता की जेब पर लगातार चोट पड़ रही है, तो उसकी भरपाई भाषण करेंगे या नीतियां?
देश की जनता अब आंकड़ों की बाजीगरी से ज्यादा अपनी रसोई का हिसाब देख रही है। उसे पता है कि अर्थव्यवस्था की असली परीक्षा संसद के भाषणों में नहीं, बाजार की कीमतों में होती है। और जब बाजार बोलना शुरू करता है, तब सबसे ऊंचे मंचों की आवाज भी छोटी पड़ जाती है। सत्यमेव जयते।

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