मनमोहन सिंह
नई मुंबई को देश के सबसे आधुनिक शहरों में गिना जाता है। ‘स्वच्छ सर्वेक्षण’ की रैपिड रैंकिंग में यह शहर अमूमन शीर्ष तीन में जगह बना ही लेता है। लेकिन इस चमकदार छवि के पीछे एक कड़वा और संक्रामक सच छिपा है, जिससे यहां के नागरिक रोजाना दो-चार हो रहे हैं।
हाल ही में मोरबे डैम पर जनप्रतिनिधियों का मीडियाकर्मियों के साथ हुआ दौरा जन-स्वास्थ्य की समस्याओं को सुलझाने के लिए कम और प्रशासनिक ‘सब ऑल इज वॉर्म’ का नैरेटिव सेट करने के लिए ज्यादा दिखाई दिया। डैम का पानी साफ होना एक अलग विषय है, लेकिन नागरिकों के घरों के नलों तक पहुंचते-पहुंचते उसका दूषित हो जाना एक गंभीर ढांचागत विफलता है।
जब स्थानीय नगरसेवकों और मीडिया ने दूषित पानी के कारण नागरिकों में पैâल रहे गैस्ट्रो, उल्टी और दस्त जैसी बीमारियों का मुद्दा उठाया तो महानगरपालिका के स्वास्थ्य विभाग ने एक बेहद अतार्किक दलील पेश कर दी कि उनके आधिकारिक दवाखानों में ऐसे लक्षणों वाले मरीज नहीं पहुंचे हैं। प्रशासन का यह सोचना कि एक दिहाड़ी मजदूर या कामकाजी नागरिक सुबह १० से १२ बजे के सीमित समय वाले म्युनिसिपल डिस्पेंसरी के भरोसे अपनी नौकरी दांव पर लगाएगा, जमीनी हकीकत से आंखें मूंदने जैसा है।
निजी दवाखानों के भरोसे लोग
अधिकांश नागरिक स्थानीय निजी क्लीनिकों से इलाज कराकर काम पर लौट जाते हैं। सरकारी रिकॉर्ड में आंकड़ों का न होना, जमीनी स्तर पर बीमारी के न होने का प्रमाण कतई नहीं है। गावठन और घनी आबादी वाले बेतरतीब उगे इलाकों में जल जनित बीमारियों का मुख्य कारण सिविल इंजीनियरिंग की बुनियादी खामी है। इन क्षेत्रों में सीवरेज और पेयजल की पाइपलाइनें एक-दूसरे से बिल्कुल सटकर बिछाई गई हैं।
गलती किसकी है?
जब जलापूर्ति बंद होती है तो १५-२० साल पुरानी हो चुकीं इन पाइपलाइनों के भीतर एक वैक्यूम बनता है। पाइपों में जंग लगने के कारण जो सूक्ष्म छिद्र होते हैं, यह वैक्यूम उनके जरिए आसपास बहने वाले सीवरेज के गंदे पानी को अंदर खींच लेता है और यही गटर मिश्रित पानी घरों में पहुंचता है।
दूसरी तरफ, हाउसिंग सोसायटियों के वाटर टैंकों की सफाई का कोई अनिवार्य या कड़ा म्युनिसिपल ऑडिट मैकेनिज्म जमीन पर दिखाई नहीं देता।
सच तो यह है कि नई मुंबई महानगरपालिका का पूरा तंत्र जनसेवा से अधिक ‘पुरस्कार केंद्रित’ हो चुका है। जब स्वच्छता सर्वेक्षण की टीम आने वाली होती है, तब पूरा प्रशासनिक अमला ऐसे ‘अलर्ट मोड’ पर आ जाता है, मानो आसमान से स्वच्छता दूत उतरे हों। युद्धस्तर पर सड़कें चमकाई जाती हैं, कुछ चुनिंदा पॉश वीआईपी इलाके बिल्कुल पेरिस की गलियों जैसे दिखने लगते हैं। लेकिन ‘पेरिस’ की इन चंद गलियों के पीछे छिपा असल नई मुंबई अब बुनियादी ढांचे के मोर्चे पर चरमरा रहा है।
औद्योगिक इलाके से छोड़े गए अनट्रीटेड वाटर से बजबजाते नाले और रात के अंधेरे में चोरी से छोड़ी जा रही जहरीली हवा नागरिकों को बीमार बनाकर रख दिया है। बार-बार नागरिक और एनजीओ इस मुद्दे को उठाते रहते हैं लेकिन नतीजा सिर्फ डाक के तीन पात ही है।
नई मुंबई महानगरपालिका को यह समझना होगा कि किसी भी ‘स्मार्ट सिटी’ की महानता उसकी बाहरी चकाचौंध या पीआर स्टंट से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों को मिलने वाले शुद्ध पेयजल और स्वच्छ पर्यावरण जैसे संवैधानिक अधिकारों से आंकी जाती है। अतार्किक जवाबों से पल्ला झाड़ने के बजाय प्रशासन को तुरंत दूषित जलापूर्ति, लीकेज सुधारने और व्यवस्था को दुरुस्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, अन्यथा यह तथाकथित स्वच्छ शहर जल्द ही एक बड़े स्वास्थ्य आपातकाल की चपेट में आ जाएगा।
