पश्चिम बंगाल सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध और बौद्धिक रूप से एक प्रबुद्ध राज्य है। सामाजिक सुधारों के मामले में पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र ने हमेशा देश को दिशा दिखाई है। बंगाली पुनर्जागरण (Bengal Renaissance), रवींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद, सत्यजीत रे, जोनाकी, शिल्प, रवींद्र संगीत और अपने साहित्य के कारण इसे भारत के सबसे सुसंस्कृत राज्यों में से एक माना जाता है। कोलकाता लंबे समय तक भारत की ‘सांस्कृतिक राजधानी’ के रूप में जाना जाता था। यही वजह थी कि अंग्रेजों ने सबसे पहले यहीं अपना डेरा डाला था। लेकिन वही पश्चिम बंगाल आज हिंसा, नफरत और भीड़तंत्र का प्रतीक बन गया है। पिछले दो दिनों में कोलकाता में जो घटनाएं घटीं, उसने न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि पूरे देश की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई है। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और मौजूदा सांसद अभिषेक बनर्जी पर भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया हमला जितना कायरतापूर्ण है, उतना ही क्रूर भी है। अभिषेक बनर्जी इस हमले में किस्मत से बच गए। ठीक इसके अगले ही दिन तृणमूल के ही वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी पर भी भाजपा कार्यकर्ताओं ने जानलेवा हमला कर दिया। बनर्जी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और एक वरिष्ठ नागरिक हैं, लेकिन भाजपा के हमलावरों ने उन्हें भी नहीं बख्शा। विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में भाजपा को सत्ता मिली है, लेकिन इस सत्ता का उपयोग वे जन कल्याण के बजाय अपनी राजनीतिक प्रतिशोध की खुजली मिटाने के लिए कर रहे हैं। अभिषेक बनर्जी पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे हैं और ममता उन्हें अपने पुत्र के समान मानती हैं। मूल रूप से देखें तो पश्चिम बंगाल का यह सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करते हुए सीधे रास्ते से नहीं हुआ है। ममता बनर्जी को हराने के लिए भाजपा ने हर तरह के हथकंडों और गड़बड़ियों का सहारा लिया। गृह मंत्री अमित शाह खुद कोलकाता में डेरा डाले हुए थे।
तीन लाख से ज्यादा
सशस्त्र और अर्धसैनिक बलों को उन्होंने पश्चिम बंगाल में उतारा। उससे पहले लगभग ९० लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाकर ममता बनर्जी के समर्थन के पलड़े को कमजोर किया गया। चुनाव आयोग को इस दौरान केवल हुक्म का गुलाम बने रहने के आदेश थे। इस तरह पैसे और दहशत के अतिरेक के बाद कहीं जाकर भाजपा सत्ता में आई। कम से कम ८० विधानसभा क्षेत्रों में उन्होंने नतीजों के मामले में जो हेराफेरी की, वह तो अलग ही कहानी है। पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा की यह जीत वास्तविक नहीं है, इसे हर कोई स्वीकार करता है और अब सत्ता में आने के बाद भाजपा ने पश्चिम बंगाल में नई गुंडागर्दी शुरू कर दी है। क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये तौर-तरीके मंजूर हैं? अगर मंजूर हैं तो उन्हें कोलकाता आकर इसका खुलकर एलान करना चाहिए और अभिषेक बनर्जी व कल्याण बनर्जी पर हमला करने वालों का सत्कार करके भाजपा संस्कृति का ढोल पीटना चाहिए। यदि श्री मोदी को यह भीड़तंत्र वास्तव में मंजूर नहीं है तो उन्हें चुनाव के समय भेजी गई तीन लाख की फौज दोबारा पश्चिम बंगाल भेजनी चाहिए और वहां कानून का राज स्थापित करना चाहिए। अगर ममता बनर्जी के कार्यकाल में सांसदों पर ऐसे हमले हुए होते, तो राज्यपाल ने अब तक केंद्र से पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी होती। बंगाल की आज की तस्वीर बेहद खौफनाक है। अभिषेक बनर्जी के सिर पर पत्थर मारे गए, चूंकि उन्होंने हेलमेट पहन रखा था इसलिए उनकी जान बच गई। सांसद कल्याण बनर्जी के साथ भी यही हुआ। बनर्जी ने खुद कहा है कि यह हमला पूरी तरह से सुनियोजित था और उन्हें जान से मारने की साजिश थी; लेकिन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने हमेशा की तरह पल्ला झाड़ लिया कि इन सबसे भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है, यह तो ‘जनता का गुस्सा’ है। तो क्या
सांसदों को जान से मारने का
लाइसेंस भाजपा ने कोलकाता के गुंडों को दे रखा है? ममता बनर्जी पंद्रह साल तक मुख्यमंत्री रहीं। बंगाल की जनता ने उन्हें अगाध प्रेम दिया। ममता को ‘सड़कों पर लड़नेवाली शेरनी’ कहा जाता है। अब चूंकि वे चुनाव हार गई हैं इसलिए भाजपा प्रेमी जनता इतनी गुस्सा हो गई कि ममता के सांसदों को ही मारने लगी, इस बात पर भला कौन विश्वास करेगा? यह पूरी तरह सोच-समझकर शुरू की गई गुंडागर्दी है। एक तो भाजपा ममता की पार्टी को तोड़ना चाहती है और बंगाल पर स्थाई रूप से गुंडों का राज लाना चाहती है। ममता के कार्यकाल में, भाजपा का कहना था कि बांग्लादेशी घुसपैठियों ने पश्चिम बंगाल की संस्कृति को नष्ट किया और गुंडागर्दी फैलाई तो फिर अब भाजपा के राज में जो यह भयानक गुंडागर्दी शुरू हुई है, वे लोग कौन हैं? बांग्लादेशी घुसपैठियों की जगह अब तिलकधारी गुंडों ने ले ली है। अगर कोई इसे ‘सत्ता परिवर्तन’ कह रहा है तो वह भारतीय संविधान के साथ गद्दारी कर रहा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के दो सांसदों पर हमले हुए उन्हें जान से मारने की कोशिश की गई, लेकिन इस पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुवेंदु अधिकारी और राज्यपाल रवि ने अपना मुंह तक नहीं खोला है। इसका सीधा मतलब यह है कि ये जानलेवा हमले भाजपा-प्रायोजित हैं और कानून के दायरे में रहकर किए गए हैं! वहां की सरकार का गुंडों को पूरा संरक्षण है और वे विपक्षी जनप्रतिनिधियों को जान से मारना चाहते हैं। पश्चिम बंगाल में नव-हिंदुत्व ने भी जोर पकड़ा है। कहा जा रहा है कि यह जनता का गुस्सा है तो फिर जब पेपर लीक हो रहे हैं, र्इंधन (पेट्रोल-डीजल) महंगा हो रहा है, सरकार रोज झूठ बोल रही है और महंगाई ने कोहराम मचा रखा है, ऐसी स्थिति में जनता गुस्सा होने के बजाय भाजपा के प्यार में इतनी दीवानी क्यों है? यहां संताप की सुन्नत क्यों हुई? इसका भी खुलासा होना चाहिए!
