मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिरामायण शिक्षा का जीवंत स्रोत: प्रो. मदन मोहन झा

रामायण शिक्षा का जीवंत स्रोत: प्रो. मदन मोहन झा

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र (आईकेएस) के तत्वावधान में ‘सत्ययुग में शिक्षा: सत्य-आधारित शिक्षण का उदय’ विषय पर 13वां राष्ट्रीय ऑनलाइन कॉन्क्लेव
खास बातें
* भारतीय शिक्षा परंपरा का उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति
* सत्य को अनेक दृष्टिकोणों से समझने की आवश्यकताः प्रो. सत्यपाल सिंह
* रामचरितमानस और श्रीमद्भगवद्गीता से चरित्र निर्माणः प्रो. वीके जैन
* डॉ. अलका अग्रवाल ने सत्य, नैतिकता और मूल्यपरक शिक्षा पर रखे विचार
जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत यूनिवर्सिटी, जयपुर के कुलपति प्रो. मदन मोहन झा ने भारतीय ज्ञान परंपरा और सत्ययुगीन शिक्षा व्यवस्था के विभिन्न आयामों पर बोलते हुए कहा कि संपूर्ण रामायण शिक्षा का जीवंत स्रोत है, जो मनुष्य को सत्य, मर्यादा, करुणा और लोककल्याण का मार्ग दिखाती है। उन्होंने छांदोग्य उपनिषद में वर्णित सत्यकाम जाबाल के प्रसंग का उल्लेख करते हुए सत्यनिष्ठा को भारतीय शिक्षा की आधारशिला बताया।
प्रो. झा ने कहा कि भारतीय शिक्षा परंपरा का उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास नहीं, बल्कि आत्मोन्नति, चरित्र निर्माण और पुरुषार्थ चतुष्टय— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति है। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा, गुरुकुल शिक्षा, योग, वेद, दर्शन तथा पुराणों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि समाजोपयोगी और आदर्श नागरिक का निर्माण है।
प्रो. झा तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र (आईकेएस) के तत्वावधान में ‘सत्ययुग में शिक्षा: सत्य-आधारित शिक्षण का उदय’ विषय पर आयोजित 13वें राष्ट्रीय ऑनलाइन कॉन्क्लेव में बतौर मुख्य वक्ता संबोधित कर रहे थे। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। समापन राष्ट्रगान के साथ किया गया।
आईसीसीआर चेयर फॉर संस्कृत एंड इंडियन फिलॉसफी, एमजीआई, मॉरीशस के प्रो. सत्यपाल सिंह ने भारतीय दर्शन एवं शिक्षा के दार्शनिक आयामों पर बोलते हुए कहा कि किसी भी प्रभावी शिक्षा व्यवस्था के लिए सामाजिक विज्ञानों और शारीरिक श्रम का समन्वय आवश्यक है।
प्रो. सत्यपाल सिंह ने षड्दर्शन— न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त— के साथ-साथ चार्वाक, जैन और बौद्ध दर्शन की चर्चा करते हुए भारतीय चिंतन की बौद्धिक विविधता और उदारता को रेखांकित किया। प्रो. सिंह ने जैन दर्शन के सप्तभंगी सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्य को अनेक दृष्टिकोणों से समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आचार्य केवल शिक्षक नहीं, बल्कि चरित्र और जीवन-दृष्टि के निर्माता होते हैं।
टीएमयू के कुलपति प्रो. वीके जैन ने संत कबीर के दोहे “गुरु गोविन्द दोऊ खड़े…” का उल्लेख करते हुए भारतीय संस्कृति में गुरु के सर्वोच्च स्थान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि रामायण, रामचरितमानस एवं श्रीमद्भगवद्गीता में शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, आत्मानुशासन और कर्तव्यबोध का साधन माना गया है।
प्रो. जैन ने जैन दर्शन में वर्णित कालचक्र की अवधारणा का उल्लेख करते हुए सुखमा-सुखमा और सुखमा-दुखमा कालों की चर्चा की। उन्होंने अनुभव-आधारित, परियोजना-आधारित, प्रशिक्षण-आधारित और इंटर्नशिप-आधारित शिक्षण पद्धतियों की उपयोगिता पर बल दिया।
टीएमयू आईकेएस सेंटर की कोऑर्डिनेटर डॉ. अलका अग्रवाल ने भारतीय ज्ञान परंपरा में सत्य, नैतिकता और मूल्यपरक शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा को केवल सूचना और कौशल तक सीमित न रखकर व्यक्तित्व और चरित्र निर्माण का माध्यम बनाया जाना चाहिए।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. माधव शर्मा ने किया।

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