एक चुप्पी-सी छाई है
नीले से ‘सियाह’ हुए अंबर पर,
मेघों के घने समूह सहित
“चांद खामोश है”।
तारों का टिमटिमाना शिथिल, मंद पड़ा है,
आजकल ‘रातरानी’ प्रायः गुमसुम रहती है,
चॉंदनी सहमी-सहमी है इसलिए दर्श नहीं दे रही है।
घुप अंधेरे के घूंघट की आड़ में
‘शर्मीला’ मुखड़ा लुकाए,
एकांत मानो मौन धारे है।
दरअसल ये सारे मिलकर
आधी रात में घट जाने वाली
‘मनुष्योचित करतूतों’ पर टकटकी लगाए
अचंभित हो इसी सोच में मग्न हैं।
दिवस के प्रकाश में क्या यही वो चेहरे हैं
जो श्वेत, उजले, निर्मल प्राणी होने का स्वांग रचते हैं!
माया के अधीन, दौलत के नशे में लीन,
अपने कुचक्रों से उत्पन्न तमाम दागों को छिपाने,
ये धूर्त कलाकार, दोहरा अभिनय निभाने वाले शातिर,
दो-चार मुखौटे सदैव अपनी जेब में धरे रखते हैं—
जाने कब, किस ‘नकाबरूपी मुखौटे’ की जरूरत आन पड़े!
कहीं से नारा गूंजता है—
“जय बोलो बेईमान की”
बादल आपत्ति में गरजने लगते हैं
और बिजली रोष में ललकारने लगती है!
किसी बड़ी आफत के आभास से मैं घिर जाता हूं।
-त्रिलोचन सिंह अरोरा
