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टूटते सारे रिश्ते…

आज फिर ‘धराशायी’ हो गया विश्वास,
बदलती दुनिया में ‘किस’ पर करें हम भरोसा?
जब अपने ही घोंप रहे हैं ‘खंजर’, तभी तो
आज टूटते जा रहे हैं सारे ‘रिश्ते-नाते।’

दुनिया कहां जा रही है आधुनिकता में,
प्यार, मोहब्बत सब ‘बेमानी’ लगते हैं।
ऐसे में जब ‘अपने’ ही देते हैं धोखा,
तभी तो टूटते हैं सारे रिश्ते-नाते।

आज बदलते ‘जमाने’ में ‘सोनम’ या ‘सिया’ बनना,
नकारात्मकता की परिभाषा बनती जा रही है।
जन्म-जन्म तक साथ निभाने के ‘झूठे’ वादे करना,
गलत हो रहा सब, तभी तो ‘टूटते’ जा रहे हैं सारे रिश्ते-नाते।

पसंद-नापसंद अपनी होती है, फिर ऐसा धोखा क्यों?
किसी ‘बेगुनाह’ को मारकर क्या मिल गया?
क्या यही युवा पीढ़ी का ‘कल्चर’ है? प्यार नहीं, यह तो विश्वासघात है।
तभी तो टूटते जा रहे हैं सारे रिश्ते-नाते॥

प्रेषक:
स्वतंत्र लेखक
हरिहर सिंह चौहान
जबरी बाग, नसिया, इंदौर, मध्य प्रदेश

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