मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा: हर सच बोल देना समझदारी नहीं होती

फलसफा: हर सच बोल देना समझदारी नहीं होती

सना खान

एक बुजुर्ग कारीगर अपने बेटे के साथ लकड़ी का काम करता था। लोग दूर-दूर से उसकी बनाई चीजें खरीदने आते थे। एक दिन एक ग्राहक ने एक छोटी-सी कमी निकाल दी। बेटा तुरंत बोला, ‘पिताजी, इन्हें सच-सच बता दीजिए कि गलती इन्हीं की है।’ बुजुर्ग ने मुस्कुराकर ग्राहक की बात ध्यान से सुनी, उसकी समस्या दूर की और उसे संतुष्ट होकर विदा किया। घर लौटते समय बेटे ने पूछा, ‘जब आपकी गलती नहीं थी, तब आपने सफाई क्यों नहीं दी? बुजुर्ग ने कहा, ‘बेटा, हर सच उसी समय बोल देना समझदारी नहीं होती। कुछ सच रिश्ते बचाने के लिए सही समय का इंतजार करते हैं।’ बेटा चुप हो गया। कई महीने बीत गए। एक दिन वही ग्राहक फिर उनकी दुकान पर आया। इस बार उसके साथ उसका बेटा भी था। उसने सबके सामने कहा, ‘उस दिन गलती मेरी थी। आपने चाहा होता तो उसी समय मुझे गलत साबित कर सकते थे, लेकिन आपने मेरी बात का सम्मान रखा। उसी दिन मुझे अपनी भूल का एहसास हो गया था। आज मैं अपने बेटे को इसलिए लाया हूं कि वह सीखे-बड़प्पन जीतने में नहीं, समझदारी से निभाने में होता है।’ उस ग्राहक की बात सुनकर बेटा कुछ पल तक चुप रहा। उसने पहली बार देखा कि उसके पिता ने कोई बहस जीते बिना एक इंसान का दिल जीत लिया था। उसी क्षण उसे समझ आया कि हर सच तुरंत कह देना ही सबसे बड़ी समझदारी नहीं होती। कई बार सही समय पर कही गई बात, सही होने से भी अधिक असर छोड़ जाती है।
बुजुर्ग ने धीरे से कहा, ‘अगर उस दिन मैं अपनी बात साबित करने में लग जाता, तो शायद यह इंसान अपनी गलती कभी स्वीकार ही नहीं करता।’ उस दिन बेटे को समझ आया कि सच की ताकत सिर्फ उसे कह देने में नहीं, बल्कि सही समय पर सही तरीके से कहने में होती है। हर सच बोल देना समझदारी नहीं होती। सच की कीमत सिर्फ उसकी सच्चाई में नहीं, उसे कहने के समय और तरीके में भी होती है। सच का उद्देश्य किसी को हराना नहीं, बल्कि सही राह दिखाना होना चाहिए।

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