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म्हाडा के नाम पर 29 लाख की कथित ठगी… सपनों का घर दिखाकर बुज़ुर्ग दंपति को बनाया शिकार, ‘स्टॉप पेमेंट’ वाले चेक देकर किया खेल?

सामना संवाददाता / मुंबई

“म्हाडा का फ्लैट दिलाएंगे”—इस एक झूठे भरोसे की कीमत एक सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी और उनकी पत्नी को 29 लाख रुपये चुकानी पड़ी। छह वर्षों तक आश्वासनों का जाल, फर्जी दस्तावेजों का कथित खेल, सत्ता के गलियारों तक पहुंच होने के दावे और आखिर में “स्टॉप पेमेंट” वाले चेक। यह पूरी कहानी किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि शिवाजी पार्क पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में लगाए गए गंभीर आरोपों का हिस्सा है।
शिवाजी पार्क पुलिस ने इस मामले में किन्नरी ठाकूर, अनिल आगवणे और नागदेव भार्गव राणे के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। शिकायतकर्ता सूर्यकांत म्हसकर, जो बैंक ऑफ बड़ौदा से हेड कैशियर के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं, का आरोप है कि उन्हें प्रभादेवी स्थित म्हाडा के एक फ्लैट का झांसा देकर उनकी जीवनभर की कमाई के 29 लाख रुपये ले लिए गए।
एफआईआर के अनुसार, वर्ष 2020 में आरोपियों ने स्वयं को म्हाडा से जुड़े प्रभावशाली एजेंट बताकर शिकायतकर्ता का विश्वास जीता। नोटरीकृत एमओयू कराया गया, फ्लैट दिखाया गया, एक वर्ष के भीतर कब्जा दिलाने का वादा किया गया और किस्तों में भुगतान लिया गया। शिकायत के अनुसार, नवंबर 2020 से जनवरी 2023 के बीच चेक और आरटीजीएस के माध्यम से कुल 29 लाख रुपये लिए गए।
यहीं से मामला और गंभीर हो जाता है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उनकी पत्नी के नाम से म्हाडा में झूठी जानकारी वाला आवेदन भी दाखिल कराया गया। जब उन्होंने इस पर आपत्ति जताई तो कथित तौर पर कहा गया कि “ऐसा किए बिना फ्लैट नहीं मिलेगा।” यदि यह आरोप सही हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या सरकारी व्यवस्था का नाम लेकर आम नागरिकों को गुमराह किया जा रहा था?
जब वर्षों बाद भी फ्लैट नहीं मिला तो शिकायतकर्ता ने अपनी राशि वापस मांगी। आरोप है कि उन्हें 20 लाख रुपये के चार पोस्ट-डेटेड चेक दिए गए, लेकिन बैंक में जमा करते ही सभी चेक “स्टॉप पेमेंट” के कारण लौट आए। इसके बावजूद व्हाट्सऐप संदेशों के माध्यम से बार-बार “थोड़ा समय दीजिए, पैसे ईमानदारी से लौटा देंगे” जैसे आश्वासन दिए जाते रहे।
एफआईआर में यह भी आरोप है कि शिकायतकर्ता को म्हाडा कार्यालय ले जाकर एक अधिकारी से मिलवाया गया, जिससे पूरे सौदे को सरकारी वैधता का आभास कराया गया। बाद में कार्यालय बंद हो गया, वादे अधूरे रह गए और रकम भी वापस नहीं मिली।
यह मामला केवल एक परिवार के साथ हुई कथित ठगी का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है, जिसमें ‘सरकारी फ्लैट’ के नाम पर सपनों का कारोबार करने वालों के हौसले इतने बुलंद हो जाते हैं। यदि एफआईआर में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि आम नागरिकों के भरोसे के साथ भी गंभीर छल होगा।
अब निगाहें पुलिस जांच पर टिकी हैं। यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह मामला उन लोगों के लिए भी चेतावनी साबित होगा, जो सरकारी योजनाओं के नाम पर बिचौलियों के झांसे में आ जाते हैं।

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