प्रमोद भार्गव
देश में दलहन और तिलहन का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, बावजूद देश में दालों और खाद्य तेलों की कमी बनी हुई है। आयात करके दाल और तेल की आपूर्ति की जा रही है। लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में कृषि एवं किसान कल्याण राज्यमंत्री रामनाथ ठाकुर ने बताया था कि बीते पांच सालों में दलहन और तिलहन के उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई है, लेकिन घरेलू मांग को पूरी करने के लिए बड़े पैमाने पर इन खाद्यों का आयात करना पड़ता है। साल 2024-25 में देष का कुल दलहन उत्पादन 256.83 लाख टन और तिलहन का उत्पादन 429.89 लाख टन था। जबकि साल 2023-2024 में दलहन 242.46 लाख टन और तिलहन का उत्पादन 396.69 लाख टन रहा था। नतीजतन 2024-25 में दालों का आयात बढ़कर 72.56 लाख टन हो गया, जो पांच साल के पहले की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है। इसी तरह आयात बिल भी बढ़कर 46,427 करोड़ रुपय तक पहुंच गया। इसी प्रकार 2024-25 में खाद्य तेलों का आयात 164.10 लाख टन रहा। जिस पर देष को 1.46 लाख करोड़ रुपए से अधिक खर्च करने पड़े। घरेलू मांग और उत्पादन के बीच बड़े अंतर के चलते आयात की जरूरत पड़ती है। इस चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने दलहन में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य तो तय कर दिया है, लेकिन अभी परिणाम मिलना शुरू नहीं हुए हैं।
भारत सरकार ने दो प्रमुख कृषि योजनाओं की शुरुआत की है। ये धन-धान्य और दलहन आत्मनिर्भरता मिशन नाम से की गई ये योजनाएं यदि खेत में खरी उतरती हैं तो किसान की माली हालत तो सुधरेगी ही देश दाल उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर भी हो जाएगा। इन योजनाओं के लिए 35,440 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। ये योजनाएं खासतौर से पिछड़े सौ जिलों में कृशि उत्पादकता बढ़ाने और विविध फसलों की पैदावार को प्रोत्साहित करने की दृश्टि से आरंभ की जा रही हैं। दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के लिए वर्श 2030-31 तक उत्पादन को 252 लाख टन से बड़ाकर 350 लाख टन करने का लक्ष्य तय किया है। इस हेतु 35 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि दलहन उत्पादन के दायरे में लाई जाएगी। विडंबना देखिए, भारत दुनिया का सबसे बड़ा दलहन उत्पादन और उपभोक्ता देष है, लेकिन दालों की आपूर्ति आयात पर निर्भर है। हालांकि, नरेंद्र मोदी के 12 साल के कार्यकाल में कृशि निर्यात दोगुना हो गया है। लेकिन दालें आयात करनी पड़ती हैं।
आहार में पौश्टिक तत्वों का कारक मानी जाने वाली दालें,बढ़ते दामों के कारण गरीब की षारीरिक जरूरत पूरी नहीं कर रही हैं। ये हालात मानसून के दौरान औसत से कम या ज्यादा बारिश होने से तो उत्पन्न होते ही हैं, किसान के नकदी फसलों की ओर रुख करने के कारण भी हुए हैं। यही नहीं यह स्थिति इसलिए भी बनी, क्योंकि कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार की गलत नीतियों के चलते किसान को खाद्य वस्तुओं की बजाय, ईंधन, प्लास्टिक और फूलों की फसल उगाने के लिए, कृषि विभाग ने जागरूकता के अभियान चलाए। यही वजह रही कि भूमंडलीकरण के दौर में दालों की पैदावार लगातार कम होती चली गई। दाल उत्पादन का रकबा लगभग 15 हजार हेक्टेयर कम हो गया। भारत में दालों की सालाना खपत 220 से 230 लाख टन है। मांग और आपूर्ति के इस बड़े अंतर के चलते जमाखोरों और दाल के आयातक व्यापरियों को भी बारे-न्यारे करने का मौका मिल जाता है। इस साल बारिष की कमी के चलते दालों का उत्पादन भी कम होने की आषंका है।
पौश्टिक आहार देष के हरेक नागरिक के स्वस्थ जीवन से जुड़ा अहम् प्रष्न है। संविधान के मूलभूत अधिकारों में भोजन का अधिकार षामिल है। दालें प्रोटीन और पौश्टिकता का महत्वपूर्ण जरिया हैं। चूंकि दालें आयात करनी होती हैं, इसलिए इनके भाव भी बीच-बीच में बढ़ जाते हैं। इस कारण मध्यवर्गीय व्यक्ति की थाली से दाल गायब होने लगती है। चुनांचें दालें व्यक्ति की सेहत से जुड़ी हैं और बीमारी की हालत में तो रोगी को केवल दाल-रोटी खाने की ही सलाह चिकित्सक देते हैं। वर्श 1951 में प्रतिव्यक्ति दालों की उपलब्धता 60 ग्राम थी,जो वर्श 2010 में घटकर 34 ग्राम रह गई। जबकि अंतरराश्ट्रीय मानकों के अनुसार यह मात्रा 80 ग्राम होनी चाहिए। दालें भारत में प्रोटीन का प्रमुख स्त्रोत मानी जाती हैं। लेकिन स्थानीय मांग पूरी करने के लिए दाल उत्पादन में किसान को बड़ी मषकक्त करनी पड़ती है। तुअर दाल की फसल आठ माह में तैयार होती है। बावजूद किसान को उचित दाम नहीं मिलते हैं। गोया,किसान साल में एक फसल उगाने में रुचि कैसे लें? विदेशों में रहने वाले भारतीय भी सबसे ज्यादा तुअर की दाल खाना पसंद करते हैं। देष में सबसे अधिक चने और अरहर की खेती होती है। इनके अलावा मूंग और उड़द की दालें पैदा होती हैं। देष में 10 राज्यों के किसान दालों की खेती करते हैं। इनमें सबसे अधिक उत्पादक राज्य महाराष्ट्र है। दालें मुख्य रूप से खरीफ की फसल हैं, जो वर्षा ऋतु में बोई जाती हैं। इस ऋतु में करीब 70 प्रतिशत दालों का उत्पादन होता है।
केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अनुसार, दालों के तात्कालिक भाव 72 रुपए प्रति किलो से लेकर 130 रुपए किलो तक हैं। अरहर दाल 120 से 130 रुपए प्रति किलो और मूंग दाल 98 रुपए प्रति किलो हैं। भावों में इस उछाल का कारण जमाखोरी और सट्टेबाजी के साथ आयात का कुचक्र भी है। टाटा, मंहिद्रा, ईजी-डे और रिलांइस जैसी बड़ी कंपनियां जब से दाल के व्यापार से जुड़ी हैं, तब से ये जब चाहे तब मुनाफे के लिए दाल से खिलवाड़ करने लग जाती हैं। जब कंपनियां बड़ी तादाद में दालों का भंडारण कर लेती हैं, तो भावों में कृत्रिम उछाल आ जाता है। हालांकि, केंद्र सरकार ने दालों का भंडारण सीमित करके भी भावों को नियंत्रित करने का उपाय करती है। इस कारण तात्काल भाव नियंत्रित हो जाते हैं। लेकिन मीडिया दाल के बढ़ते भावों को गरीब की थाली से जोड़कर उछालता है। तब सरकार दाल के आयात के लिए विवश हो जाती है। मसलन, देषी-विदेषी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हर हाल में पौ-बारह बने रहते हैं। इन कंपनियों का दबदबा इतना है कि कोई भी राज्य सरकार इनके गोदामों पर छापे डालने का जोखिम उठाने का साहस नहीं जुटा पाती। लिहाजा, कालाबाजारी बदस्तूर रहती है। ये कंपनियां मसूर और मटर की दाल कनाडा से, उड़द और अरहर की दाल बर्मा के रंगून से,राजमा चीन से और काबुली चना आस्ट्रेलिया से आयात करती हैं। इनके अलावा अमेरिका, रूस, केन्या, तंजानिया, मोजांबिक, मलावा और तुर्की से भी दालें आायात की जाती हैं। कनाडा ने मसूर दाल के भाव भारत में मांग होने के वक्त अकसर बढ़ा देता है। कनाडा एषियाई देषों में सबसे ज्यादा दालों का निर्यात करने वाला देष है।
इस नाते यह कहने में कोई दो राय नहीं कि विदेषी बहुराश्ट्रीय कंपनियों की बात तो छोड़िए,देषी कंपनियां भी भारतीय कृशि को बदहाल बनाए रखना चाहती हैं। आयात की जब इन्हें खुली छूट मिल जाती है तो ये जरूरत से ज्यादा दाल व तेल का आयात करके भारत को डंपिंग ग्राउंड बना देती हैं। तय है,कालांतर में भारत की तरह दूसरे देशों में यदि मौसम रूठ जाता है तो दाल और प्याज की तरह खाद्य-तेल के भाव भी आसमान छूने लग जाते हैं। सस्ते तेल का आयात जारी रहने की वजह से ही भारत में तिलहन का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। बावजूद हमारे नेता ऐसी नीतियों को बढ़ावा देने की कोषिषों में लगे रहे हैं कि दलहन और तिलहत के क्षेत्र में भारत पूरी तरह परावलंबी बना रहे। इस परिप्रेक्ष्य में मनमोहन सरकार के कृशि मंत्री बलराम जाखड़ ने सलाह दी थी कि भारत अफ्रीका में दालें उगाए और फिर आयात करे। इसी तरह संप्रग सरकार में कृशि मंत्री रहे षरद पवार म्यांमार और उरूग्वे में दालें पैदा कराकर आयात करना चाहते थे। ये सुझाव समझ से परे हैं। आखिर ऐसे क्या रहस्य हैं कि हमारे नीति-नियंता विदेशी धरती पर तो दाल उत्पादन को प्रोत्साहित करना चाहते हैं, किंतु देश के किसानों को लाभकारी मूल्य देना नहीं चाहते ? ऐसी भाषाएं देश की खाद्य सुरक्षा को जान-बूझकर संकट में डालने जैसी लगती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नाते 100 पिछड़े जिलों में दालों के उत्पादन का दायरा बढ़ाकर आत्मनिर्भरता की दिषा में महत्वपूर्ण पहल की है।
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)
