डॉ. धीरज फूलमती सिंह
फूहड़, अश्लील, विवादित और बेतरतीब स्टैंड-अप कॉमेडी के जमाने में ‘अंटाधार-बंटाधार’ एक काफी सधा हुआ (सोबर) शो है। अब इसमें ‘अंटाधार’ शब्द का अर्थ समझने की कोशिश मत कीजिए, क्योंकि इसका कोई विशेष मतलब नहीं है। इसे बस तुकबंदी को मजेदार और धारदार बनाने के लिए प्रयोग किया गया है। वहीं ‘बंटाधार’ शब्द का अर्थ तो लगभग हर हिंदी प्रेमी भारतीय जानता ही है।
‘अंटाधार-बंटाधार’ स्टैंड-अप कॉमेडी शो प्रसिद्ध हास्य कलाकार और कवि राजीव निगम का कार्यक्रम है। राजीव निगम अपनी साफ-सुथरी और व्यंग्यात्मक शैली की प्रस्तुतियों के लिए जाने जाते हैं। इस शो में भी उन्होंने अपनी इसी काबिलियत का प्रदर्शन किया है। शो में बड़े ही शालीन, संयमित और संस्कारित तरीके से चुटकुले प्रस्तुत किए गए हैं। कई जगहों पर संवाद के लिए मौन अभिव्यक्ति या इशारों का भी सहारा लिया गया है।
मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए किया गया है ताकि सोशल मीडिया के इस दौर में किसी प्रकार के विवाद से बचा जा सके, ट्रोलिंग से बचते हुए दर्शकों तक अपनी बात पहुंचाई जा सके और किसी कानूनी या सामाजिक फजीहत से भी बचा जा सके। यह सावधानी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है और यह तरीका उचित भी है।
भाषा, राजनीति, जाति और सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर चतुराई से गुदगुदाने वाले चुटकुले प्रस्तुत किए गए हैं, लेकिन धार्मिक व्यंग्य से सावधानीपूर्वक परहेज किया गया है। शायद यह भी किसी विवाद से बचने की रणनीति रही हो।
आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, भाजपा जैसे राजनीतिक विषय ऐसे मंचों के पसंदीदा विषय बन चुके हैं। राजीव निगम ने इन विषयों का उपयोग करते हुए दर्शकों को खूब हंसाया और लोटपोट किया है। हालांकि, राहुल गांधी या कांग्रेस जैसे विषयों को छूने से परहेज किया गया, जिससे संतुलन थोड़ा असमान प्रतीत हुआ।
शो में समसामयिक घटनाओं और किस्सों को व्यंग्यात्मक शैली में बहुत अच्छे तरीके से प्रस्तुत किया गया है, जिससे दर्शक हंसने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर होता है। यह शैली प्रभावशाली रही। भगवान राम, हनुमान, सीता और लक्ष्मण जैसे पौराणिक पात्रों पर भी संयमित ढंग से व्यंग्य किया गया है। हालांकि, शो के दौरान मुझे एक बात खटक रही थी कि आगे की पंक्तियों में कुछ महिलाएं साधारण चुटकुलों पर भी अनावश्यक रूप से जोर-जोर से हंस रही थीं, जिससे वह हंसी थोड़ी बनावटी प्रतीत हो रही थी।
हिंदी और मराठी भाषा विवाद को इस शो में बेहद रोचक और प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया गया है। शो का यह हिस्सा सबसे मनोरंजक और ठहाकों से भरपूर रहा। इसमें मुंबई के आम लोगों की भाषा-संबंधी उलझन, झिझक और सामाजिक स्थिति को भी बड़े प्रभावी ढंग से दर्शाया गया है। इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनलों के खोखलेपन, विवाद पैदा करने की प्रवृत्ति और समाचारों के गिरते स्तर पर भी व्यंग्यात्मक प्रहार किया गया है, जो दर्शकों को हंसाने के साथ सोचने पर मजबूर करता है। हालांकि, अखबारी जगत को इस बार लगभग नहीं छुआ गया।
कुछ चुटकुले अपेक्षाकृत कमजोर और पुराने भी लगे, जिन्हें नए अंदाज में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई थी। कई बार ऐसा भी लगा जैसे कुछ संदर्भ पहले से सुने हुए हों। राजीव निगम ने हिंदू, मुस्लिम और हिंदुस्तान जैसे विषयों को संतुलित ढंग से प्रस्तुत कर एक प्रभावशाली व्यंग्य पेश किया है। दर्शकों की तालियों और प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि यह प्रस्तुति काफी सफल रही।
शो के अंत में माफी मांगना यह भी दर्शाता है कि कलाकार सोशल मीडिया ट्रोलिंग और विवादों से सतर्क रहते हैं, जो आज के समय की वास्तविकता भी है। दुर्भाग्य यह है कि ट्रोलिंग के डर से कई प्रतिभाशाली कलाकार अपनी अभिव्यक्ति को पूरी तरह से खुलकर प्रस्तुत नहीं कर पाते। यदि यह स्थिति बनी रही, तो व्यंग्य और हास्य की स्वतंत्र शैली पर असर पड़ सकता है। व्यंग्यात्मक कला समाज को जागरूक करने और मनोरंजन के साथ सोचने पर मजबूर करने का एक सशक्त माध्यम है, जिसे संरक्षित रखना आवश्यक है।
