मुख्यपृष्ठस्तंभअंदर की बात : हाफकिन को फिर मिलेगा इंजेक्शन!

अंदर की बात : हाफकिन को फिर मिलेगा इंजेक्शन!

राजन पारकर

हाफकिन संस्थान को आधुनिक बनाने के लिए फिर से फंड देने की घोषणा हुई है। सरकार कहती है कि यह संस्था देश की शान है, उसे फिर से सक्षम बनाया जाएगा। मंत्रालय के गलियारों में चर्चा है कि हाफकीन को हर कुछ वर्षों में ‘पुनर्जीवित’ करने की घोषणा होती है, लेकिन मरीज की तरह संस्था फिर आईसीयू में पहुंच जाती है। करोड़ों की मांग, करोड़ों की मंजूरी और फिर अगली बैठक में वही पुरानी फाइलें। कर्मचारियों की समस्याएं, वेतन, आवास और उत्पादन क्षमता पर वर्षों से रिपोर्टें बनती रही हैं। अब नया वादा है कि मुख्यमंत्री स्तर पर बैठक होगी। व्यंग्य यह है कि हाफकिन को दवा बनाने से पहले खुद इलाज की जरूरत पड़ रही है। जनता का सवाल सीधा है- अगर पोलियो और अन्य जीवनरक्षक वैक्सीन बनाने वाली संस्था खुद ‘ऑक्सीजन’ पर रहेगी, तो आत्मनिर्भर स्वास्थ्य व्यवस्था का सपना कौन पूरा करेगा?
‘जहर, जिम्मेदारी और जमीर… क्या कार्रवाई सिर्फ कागजों पर?’
जंगल में जहर… व्यवस्था कटघरे में!
मेलघाट के जंगल में कुछ वन्यजीव जहर से मर गए। सरकार कह रही है कि जांच होगी, आरोपी पकड़े गए हैं और रिपोर्ट आने के बाद कड़ी कार्रवाई होगी। यह सब सुनकर जंगल के पेड़ भी शायद मुस्कुरा रहे होंगे, क्योंकि हर बड़ी घटना के बाद सरकारी शब्दकोश में सबसे पहले ‘सख्त जांच’ और ‘कड़ी कार्रवाई’ ही जन्म लेते हैं।
राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि वन्यजीवों से ज्यादा चिंता अब इस बात की है कि कहीं जांच की आंच विभागीय लापरवाही तक न पहुंच जाए। सूत्रों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय तस्करी का हवाला देकर मामला बड़ा तो बताया जा रहा है, लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि निगरानी इतनी मजबूत थी तो जहर जंगल तक पहुंचा वैâसे? वन मंत्री ने सैटेलाइट निगरानी, गश्त और सतर्कता बढ़ाने की घोषणा की है। जनता पूछ रही है -अगर यह सब पहले से था, तो फिर जंगल में मौत का यह मंजर किसकी निगरानी में तैयार हुआ?
नाम चैरिटी, काम कमाई!
सरकार ने चेतावनी दी है कि नियम तोड़ने वाले चैरिटी अस्पतालों पर सख्त कार्रवाई होगी। जिलास्तरीय जांच समितियां बनेंगी, डैशबोर्ड देखे जाएंगे, योजनाओं की समीक्षा होगी। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि जांच समितियों की फाइलें अक्सर मरीज से ज्यादा स्वस्थ रहती हैं। अस्पतालों में गरीब इलाज के लिए कतार में खड़ा रहता है, लेकिन बिल देखकर उसे लगता है कि शायद वह किसी पांच सितारा होटल में भर्ती हो गया है। सूत्रों के अनुसार, अब विशेष अभियान चलेगा, अतिरिक्त जिलाधिकारी निगरानी करेंगे और नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई होगी। जनता पूछ रही है- क्या यह अभियान भी पिछली जांचों की तरह फाइलों में भर्ती होकर डिस्चार्ज हो जाएगा? चैरिटी अस्पतालों की सबसे बड़ी बीमारी शायद मरीज नहीं, बल्कि जवाबदेही की कमी है। इलाज की जरूरत वहां भी है, लेकिन दवा प्रशासन को खानी पड़ेगी।
तीन विभाग… तीन घोषणाएं…
जंगल में जहर मिला तो जांच का वादा, अस्पतालों में अव्यवस्था मिली तो अभियान का वादा और हाफकीन में कमजोरी मिली तो फंड का वादा। जनता अब घोषणाओं की नहीं, नतीजों की प्रतीक्षा कर रही है। चर्चा है कि सरकार की प्रेस कॉन्प्रâेंस में ‘कड़ी कार्रवाई’ सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला वाक्य बन चुका है, जबकि आम आदमी पूछ रहा है- ‘कार्रवाई की फोटो कब आएगी?’
आखिर लोकतंत्र में सबसे बड़ा जहर जंगल का नहीं, बल्कि वह व्यवस्था है, जिसमें हर समस्या का इलाज सिर्फ अगली घोषणा बनकर रह जाता है।

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