-पहले इनकार, अब दस्तावेज ने खोली पोल
-डीसीपी के आदेश पर आरएएफ की कार्रवाई का दावा; पैलेट गन की वैधता, जवाबदेही और पुलिस के बदलते बयानों पर उठे गंभीर सवाल
-लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछने वाले छात्रों को उत्तर की जगह छर्रे मिलें, तो जख्म केवल शरीर पर नहीं लगते- सरकार की नीयत और लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता भी घायल होती है।
नई दिल्ली
जंतर-मंतर पर २० जुलाई को हुए ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान छात्रों और प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाए जाने के आरोपों ने अब नया और गंभीर मोड़ ले लिया है। दिल्ली पुलिस से जुड़े एक दस्तावेज में कथित तौर पर दर्ज है कि डीसीपी राजा बांठिया के आदेश के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की विशेष इकाई रैपिड एक्शन फोर्स ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पैलेट हथियारों का इस्तेमाल किया था। दस्तावेज में ७० से अधिक शेल, टीयर स्मोक ग्रेनेड, दंगारोधी हथियार और प्लास्टिक पैलेट के इस्तेमाल का उल्लेख होने का दावा किया गया है।
यह खुलासा इसलिए अधिक गंभीर है, क्योंकि प्रदर्शन के तुरंत बाद पुलिस ने पैलेट गन चलाए जाने के आरोपों से इनकार किया था। अब सामने आए रिकॉर्ड और अधिकारियों के परस्पर विरोधी बयानों ने सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सच कौन छिपा रहा था। एक ओर पुलिस अधिकारी आदेश देने से इनकार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आरएएफ की आंतरिक समीक्षा में भीड़ नियंत्रण के लिए प्लास्टिक पैलेट के इस्तेमाल को अधिकृत और तय प्रक्रिया के अनुरूप बताया गया है। कुछ समाचार रिपोर्टों में दस्तावेज की प्रविष्टि के समय और प्रामाणिकता की भी जांच किए जाने की बात कही गई है।
छात्रों पर पैलेट क्यों?
पैलेट गन को सरकारी एजेंसियां भले ही ‘कम घातक’ हथियार बताती हों, लेकिन इसके छर्रे आंख, चेहरे और शरीर के संवेदनशील हिस्सों में घुसकर गंभीर तथा स्थायी नुकसान पहुंचा सकते हैं। जंतर-मंतर झड़प में घायल एक युवक के चेहरे और गर्दन से पैलेट निकालने के लिए ऑपरेशन करना पड़ा। उसकी आंख में रक्तस्राव, चेहरे पर घाव और टांके लगे थे। ऐसे में सवाल है कि परीक्षा व्यवस्था में कथित भ्रष्टाचार और पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठा रहे युवाओं पर ऐसा हथियार इस्तेमाल करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
आदेश किसने दिया,
हिसाब कौन देगा?
यदि कार्रवाई डीसीपी स्तर के अधिकारी के आदेश पर हुई, तो आदेश का लिखित रिकॉर्ड, खतरे का आकलन और बल प्रयोग की क्रमवार अनुमति सार्वजनिक होनी चाहिए। यदि किसी अधिकारी ने आदेश नहीं दिया, तो आरएएफ ने पैलेट किस अधिकार से चलाए? और यदि दस्तावेज में गलत या बाद की तारीख में प्रविष्टि की गई, तो इसके पीछे कौन था? यह मामला अब केवल भीड़ नियंत्रण का नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक जवाबदेही का बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर
पैलेट गन पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका भी दाखिल की गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर ऐसे हथियार का इस्तेमाल जीवन, शारीरिक सुरक्षा और विरोध के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है।
वे सवाल जिनका जवाब जरूरी
पैलेट चलाने का वास्तविक आदेश किसने दिया?
७० से अधिक शेल का दावा किन हथियारों और गोला-बारूद से जुड़ा है?
पुलिस ने शुरुआती चरण में पैलेट गन के इस्तेमाल से इनकार क्यों किया?
क्या मजिस्ट्रेट या वरिष्ठ अधिकारी से पूर्व अनुमति ली गई थी?
घायलों की संख्या और मेडिकल रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?
क्या बल प्रयोग के पहले चेतावनी और कम नुकसान वाले सभी विकल्प आजमाए गए थे?
संबंधित दस्तावेज की प्रविष्टि बाद में हुई तो जिम्मेदार कौन है?
