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तहकीकात : स्कूल बैग में किताब नहीं, नशा… कच्ची उम्र के बच्चों को निगल रहा है जहर

फिरोज खान

मुंबई, जिसे ‘सपनों का शहर’ कहा जाता है, वहीं आज हमारे बच्चे सपनों की जगह नशे की गली में जा रहे हैं। स्कूल बैग में कॉपी-किताबों की जगह अब चरस, गांजा, एमडी और कोकीन के पैकेट मिलने लगे हैं।
पिछले कुछ महीनों में डीआरआई, एनसीबी और मुंबई पुलिस की कार्रवाई ने जो तस्वीर सामने रखी है, वह डराने वाली है। ११ से १६ साल के बच्चे स्कूल और ट्यूशन के नाम पर घर से निकलते हैं और शाम को नशे की हालत में लौटते हैं। कुछ स्कूल के टॉयलेट में, कुछ पार्कों में, तो कुछ कोचिंग क्लास के पीछे बैठकर नशा कर रहे हैं। कॉलेजों के गेट, रेलवे स्टेशन, झुग्गी-बस्तियां और अब तो ऑनलाइन डिलिवरी के जरिए भी ड्रग्स पहुंचाए जा रहे हैं। महज ५०० रुपए में ‘स्टार्टर पैक’ मिल जाता है। सोशल मीडिया की रील्स में नशे को ‘कूल’ दिखाया जा रहा है। ‘एक बार ट्राई करो’ जैसे चैलेंज वायरल हो रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि माता-पिता दोनों काम पर रहते हैं। बच्चे लंबे समय तक अकेले रहते हैं। निगरानी की कमी और मानसिक तनाव के बीच नशा उन्हें सहारा लगने लगता है। ड्रग पेडलर अब खास तौर पर बच्चों को निशाना बना रहे हैं, क्योंकि कम उम्र, कम शक और ज्यादा मुनाफा-यही उनका गणित है।
मुंबई पुलिस ने ‘नशा मुक्त मुंबई’ अभियान शुरू किया है। स्कूलों और कॉलेजों के ५०० मीटर के दायरे में पेट्रोलिंग, साइबर सेल की निगरानी और ड्रग पेडलरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं। एनसीबी ने पिछले छह महीनों में शहर से करोड़ों रुपए के ड्रग्स बरामद किए हैं। वहीं डीआरआई ने एयरपोर्ट पर ११ करोड़ रुपए की कोकीन जब्त की।
राज्य सरकार ने स्कूलों में काउंसलिंग सेल और हेल्पलाइन शुरू करने का ऐलान किया है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कार्रवाई अभी भी छापेमारी तक ही सीमित दिखाई देती है। एक पेडलर पकड़ा जाता है, तो उसकी जगह १० नए खड़े हो जाते हैं। सिर्फ पुलिस ही नहीं, बल्कि घर, स्कूल, समाज और हम सब भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। जब १३ साल का बच्चा कहता है, ‘सब करते हैं, सर,’ तो समझ लीजिए कि कहीं न कहीं पूरा सिस्टम नाकाम हो चुका है।
सिर्फ पोस्टर लगाने से नशा नहीं रुकेगा। इसके लिए सख्त कानून, प्रभावी निगरानी और व्यापक जागरूकता–तीनों की जरूरत है। स्कूलों के एक किलोमीटर के दायरे को ‘ड्रग-प्रâी जोन’ घोषित किया जाए, वहां सीसीटीवी वैâमरे और नियमित पुलिस बीट अनिवार्य हों। माता-पिता के लिए जागरूकता कार्यशालाएं आयोजित की जाएं। नशे में पकड़े गए नाबालिगों का इलाज और काउंसलिंग हो, उन्हें जेल नहीं भेजा जाए। लेकिन ड्रग सप्लायरों के खिलाफ सबसे कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। मुंबई में नशा हर दिन सैकड़ों बच्चों का भविष्य निगल रहा है। किसी की मौत तुरंत दिखाई देती है, तो किसी की जिंदगी धीरे-धीरे खत्म होती चली जाती है। अगर आज भी हम नहीं चेते, तो वह दिन दूर नहीं जब मुंबई के हर घर में कोई न कोई ‘नशे का मरीज’ होगा।

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