मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा : हर सुविधा इंसान को खुश नहीं बनाती

फलसफा : हर सुविधा इंसान को खुश नहीं बनाती

 सना खान

एक बुजुर्ग अपने बेटे के नए घर में पहली बार रहने आए। घर बहुत बड़ा था। हर चीज आधुनिक थी-स्मार्ट लाइटें, ऑटोमैटिक दरवाजे, बड़े-बड़े कमरे और हर सुविधा मौजूद थी। बुजुर्ग सब कुछ देखकर मुस्कुरा तो रहे थे, लेकिन उनकी आंखें जैसे किसी और चीज को खोज रही थीं। एक शाम उन्होंने देखा कि घर के चारों सदस्य एक ही कमरे में बैठे थे, लेकिन कोई किसी से बात नहीं कर रहा था। बेटा लैपटॉप पर काम कर रहा था। बहू मोबाइल पर व्यस्त थी। पोती हेडफोन लगाकर वीडियो देख रही थी और पोता ऑनलाइन गेम खेल रहा था।
बुजुर्ग कुछ देर तक सबको देखते रहे। उन्हें अपना पुराना घर याद आ गया, जहां साधन कम थे, लेकिन रात का खाना हमेशा साथ बैठकर खाया जाता था। खाने के बाद घंटों बातें होती थीं। कभी हंसी गूंजती थी, तो कभी किसी की परेशानी पूरे परिवार की चिंता बन जाती थी।
तभी अचानक बिजली चली गई। वाई-फाई बंद हो गया। मोबाइल की बैटरी भी धीरे-धीरे खत्म होने लगी। मजबूरी में सब एक साथ बरामदे में आकर बैठ गए। शुरुआत में सब चुप थे। फिर पोती ने दादाजी से पूछा, ‘आप बचपन में खेलते क्या थे?’ बस, वहीं से बातों का सिलसिला शुरू हो गया। दादाजी ने अपने बचपन की शरारतें सुनार्इं। बेटे ने वर्षों बाद अपने स्कूल के किस्से सुनाए। बहू ने अपने मायके की यादें साझा कीं। बच्चे हंसते-हंसते बार-बार नए सवाल पूछने लगे। किसी को समय का पता ही नहीं चला। कुछ देर बाद बिजली वापस आ गई। लाइटें जल उठीं। वाई-फाई भी चलने लगा। लेकिन इस बार किसी ने तुरंत अपना मोबाइल नहीं उठाया। अगले दिन बेटे ने घर में एक छोटा-सा नियम बनाया। रात के खाने के बाद आधे घंटे तक कोई मोबाइल नहीं चलाएगा। उस समय पूरा परिवार सिर्फ एक-दूसरे के साथ बैठेगा। धीरे-धीरे वह आधा घंटा घर का सबसे पसंदीदा समय बन गया।
एक शाम बुजुर्ग मुस्कुराकर बोले, ‘बिजली ने घर रोशन किया है, लेकिन उन बातों ने इस घर में फिर से अपनापन जगा दिया।’ उस दिन पूरे परिवार ने महसूस किया कि सुविधाएं जीवन को आसान जरूर बनाती हैं, लेकिन रिश्तों को मजबूत नहीं करतीं। रिश्तों को समय, संवाद और साथ की जरूरत होती है। हर सुविधा इंसान को खुश नहीं बनाती। कभी-कभी सबसे बड़ी खुशी उन पलों में मिलती है, जहां लोग एक-दूसरे के साथ दिल से जुड़े होते हैं, न कि सिर्फ एक ही घर में रहते हैं।

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