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पाकिस्तान की दो नावों में सवारी…कूटनीति या मजबूर नीति?

मनमोहन सिंह

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर पाकिस्तान इन दिनों एक ऐसे कुशल नट की भूमिका में है, जो एक पैर अमेरिका की नाव पर और दूसरा पैर ईरान की नाव पर रखकर नदी पार करने की कोशिश कर रहा है। ये दोनों नावें जिन दिशाओं में जा रही हैं, उनमें छत्तीस का आंकड़ा है। ऐसे में सवाल उठता है कि पाकिस्तान की यह ‘दो नावों की सवारी’ एक मास्टरस्ट्रोक है या फिर किसी बड़े हादसे का आमंत्रण?
मजबूरी का नाम कूटनीति? पाकिस्तान के लिए यह कोई शौक नहीं, बल्कि वक्त की जरूरत और मजबूरी का कॉकटेल है।
अमेरिका (आर्थिक लाइफलाइन): वॉशिंगटन से पाकिस्तान का रिश्ता पुराना और नफा-नुकसान पर आधारित है। आईएमएफ के कर्ज और वैश्विक मंचों पर ‘ग्रे लिस्ट’ जैसी आफत से बचने के लिए पाकिस्तान को अमेरिका के हाथ की बैसाखी चाहिए ही चाहिए।
ईरान (भौगोलिक हकीकत): पड़ोसी बदला नहीं जा सकता। ईरान के साथ लगती लंबी सीमा, सुरक्षा चुनौतियां और ‘ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन’ जैसी परियोजनाएं पाकिस्तान को तेहरान के करीब रहने पर मजबूर करती हैं।
कड़वा सच: एक तरफ अमेरिका की कड़कती जेब है, तो दूसरी तरफ ईरान का कड़क मिजाज। पाकिस्तान दोनों में से किसी एक को भी पूरी तरह खोने का जोखिम नहीं उठा सकता।
इस सवारी का जोखिम
इतिहास गवाह है कि दो नावों की सवारी करने वाले अक्सर बीच मंझधार में ही डूबते हैं। पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘भरोसे का संकट’ है। जब आप अमेरिका को खुश करने के लिए कोई कदम उठाते हैं, तो ईरान की भौंहें तन जाती हैं। वहीं, जब ईरान के साथ कोई डील आगे बढ़ती है, तो वॉशिंगटन से प्रतिबंधों की घुड़की मिलने लगती है। भारत जहां अपनी विदेश नीति में ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के तहत खुलकर और डंके की चोट पर पैâसले लेता है, वहीं पाकिस्तान को हर कदम पर ‘बैलेंसिंग एक्ट’ करना पड़ता है।
तो अब क्या कहा जाए…?
फिलहाल, तो पाकिस्तान इस दोहरी सवारी में खुद को ‘एक कदम आगे’ मान सकता है, लेकिन कूटनीति के इस खेल में संतुलन कब बिगड़ जाए, कहा नहीं जा सकता। अगर अमेरिका या ईरान में से किसी एक ने भी अपनी नाव थोड़ी और दूर खींची, तो पाकिस्तान के लिए बीच में संभलना नामुमकिन हो जाएगा। यह सवारी जितनी रोमांचक दिखती है, उतनी ही आत्मघाती भी साबित हो सकती है।

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