मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात :  गाजा का नया सवेरा या पुराना सियासी छलावा?

इस्लाम की बात :  गाजा का नया सवेरा या पुराना सियासी छलावा?

सैयद सलमान, मुंबई

​गाजा की ढह चुकी इमारतों और अंतहीन मलबे के बीच से आई एक खबर ने पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। लगभग दो दशकों तक गाजा पट्टी पर एकछत्र नागरिक और प्रशासनिक नियंत्रण रखनेवाले संगठन हमास ने अपनी सरकार को भंग कर सत्ता की कमान संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका समर्थित एक ‘टेक्नोक्रेटिक कमेटी’ (नेशनल कमेटी फॉर गाजा एडमिनिस्ट्रेशन) को सौंपने की घोषणा की है। सतह पर यह पैâसला गाजा के त्रस्त नागरिकों के लिए राहत और पुनर्निर्माण की एक धुंधली उम्मीद जैसा दिखाई देता है, लेकिन इसे एक रणनीतिक आत्मसमर्पण कहना ज्यादा उचित होगा। यह महज प्रशासनिक बदलाव न होकर, युद्ध के मैदान से शुरू हुआ एक नया और बेहद मुश्किल कूटनीतिक शतरंज का खेल है।
हमास की चाल!
​हमास के इस कदम को समझने के लिए तात्कालिक दबावों और दीर्घकालिक इरादों के अंतर को समझना होगा। करीब दो वर्षों से जारी इजरायली हमलों ने गाजा को एक ऐसे मानवीय संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां अब नागरिक प्रशासन चलाने के लिए न तो बुनियादी ढांचा बचा है और ना ही संसाधन। ऐसे में नागरिक जिम्मेदारी से पीछे हटकर हमास ने खुद पर से उस प्रशासनिक नाकामी का ठीकरा हटा लिया है, जो युद्ध जनित अकाल और तबाही के कारण उन पर फोड़ा जा रहा था। नागरिक प्रशासन को छोड़ना एक बड़ी रियायत के रूप में पेश किया जा रहा है, जिससे इजरायल पर अंतर्राष्ट्रीय सीजफायर और सहायता को गाजा में आने देने का नैतिक और कूटनीतिक दबाव अभूतपूर्व रूप से बढ़ गया है।
​हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे पेचीदा और गंभीर पहलू यह है कि हमास ने सत्ता तो छोड़ी है, लेकिन हथियार छोड़ने से साफ इनकार कर दिया है। इसी बिंदु पर आकर शांति की तमाम उम्मीदें एक गंभीर संशय में बदल जाती हैं। संप्रभुता का आधुनिक सिद्धांत कहता है कि किसी भी क्षेत्र में हिंसा और हथियारों पर नियंत्रण केवल एक ही वैध सरकारी सत्ता का होना चाहिए। यदि गाजा में नई तकनीकी समिति नागरिक मामले संभालेगी, लेकिन जमीन पर बंदूकें अभी भी हमास के हाथों में रहेंगी तो यह नई व्यवस्था केवल कागजी साबित हो सकती है। कोई भी नागरिक प्रशासन बंदूकों के साये में स्वतंत्र रूप से वैâसे काम कर पाएगा? जब तक सैन्य विसैन्यीकरण नहीं होता, तब तक कोई भी नई व्यवस्था हमास के ही परोक्ष नियंत्रण में रहेगी।
​दूसरी ओर, इस नई टेक्नोक्रेटिक कमेटी ‘एनसीएजी’ की अपनी चुनौतियां कम नहीं हैं। अली शाथ के नेतृत्व वाली इस समिति को अंतर्राष्ट्रीय समर्थन तो प्राप्त है, लेकिन गाजा की जमीन पर इसे स्वीकार्यता और वैधता वैâसे मिलेगी? बाहर से थोपे गए या प्रायोजित प्रशासनिक ढांचे अक्सर स्थानीय स्तर पर अविश्वास का शिकार हो जाते हैं। जो फिलिस्तीनी नागरिक कई सालों से हमास और फतह के बीच का संघर्ष, आंतरिक राजनीतिक गुटबाजी और बाहरी पाबंदियों को झेल रहे हैं, वे इस नई व्यवस्था को संदेह की नजर से देख रहे हैं। क्या यह समिति इजरायल द्वारा थोपे गए जमीनी प्रतिबंधों और नाकेबंदी के बीच स्वतंत्र रूप से स्वास्थ्य, शिक्षा और पुनर्निर्माण जैसी मूलभूत सेवाएं बहाल कर पाएगी?
बेबस फिलिस्तीनी अवाम
​इस राजनीतिक पैंतरेबाजी से साफ है कि हमास का इरादा खत्म होने का नहीं, बल्कि खुद को एक लंबी और टिकाऊ लड़ाई के लिए पुनर्गठित करने का है। युद्ध सिर्फ बंदूकों से नहीं, बल्कि नैरेटिव से भी जीता जाता है। हमास ने खुद को एक ऐसे जिम्मेदार पक्ष के रूप में प्रदर्शित करने की कोशिश की है जो गाजा के पुनर्निर्माण के लिए अपनी सत्ता का त्याग करने को तैयार है, जिससे अब गेंद पूरी तरह से इजरायल और उसके सहयोगियों के पाले में चली गई है।
हमास और इजरायल के इस रणनीतिक दांव-पेंच के बीच, सबसे गहरा और मर्माहत करनेवाला पहलू गाजा की आम फिलिस्तीनी अवाम की बेबसी और बदहाली है। करीब दो सालों से बमबारी की गूंज, अपनों को खोने के अंतहीन सिलसिले और मलबे के ढेरों के बीच जी रही यह आबादी आज बुनियादी मानवीय गरिमा के लिए तरस रही है। भूख, साफ पानी की किल्लत और चिकित्सा व्यवस्था के पूरी तरह ध्वस्त हो जाने से बिलखते बच्चों और बेघर बुजुर्गों के आंसू किसी भी राजनीतिक खेल से बड़े हैं।
​गाजा का यह संकट किसी भी प्रशासनिक फेरबदल या तकनीकी समिति के गठन मात्र से हल होने वाला नहीं है। यह सदियों पुराना एक ऐसा भू-राजनीतिक और मानवीय विवाद है, जिसमें फिलिस्तीनियों के आत्मनिर्णय का अधिकार, शरणार्थियों की वापसी और एक स्थायी द्वि-राष्ट्र समाधान जैसे मूल मुद्दों को छुए बिना कोई भी सीजफायर या अंतरिम व्यवस्था सिर्फ एक अस्थायी मरहम साबित होगी। गाजा को आज महज फाइलों को संभालने वाले नौकरशाहों की नहीं, बल्कि एक ऐसी ईमानदार अंतर्राष्ट्रीय इच्छाशक्ति की जरूरत है जो मलबे में तब्दील हो चुकी इस जमीन को दोबारा इंसान के रहने लायक और सुरक्षित बना सके।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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