मुख्यपृष्ठस्तंभभोजपुरिया व्यंग्य: चलीं लाठी खायल जाय, लोकतंत्र बचायल जाय

भोजपुरिया व्यंग्य: चलीं लाठी खायल जाय, लोकतंत्र बचायल जाय

प्रभुनाथ शुक्ल / भदोही

देखीं भाई, लोकतंत्र में जनता मालिक कहलावे, बाकि आज के हाल देखीं त कई बेर लागेला कि जनता बस वोट डाले खातिर बा, बाकी राज चलावे के तरीका कुछ अउरी हो गइल बा। जब चुनाव आवेला त नेता हाथ जोड़ के कहेला हमरा के मौका दीं। बाकि कुर्सी मिलते ही ओह कुर्सी के रंग बदल जाला। फेर जनता सड़क पर रहेले आ नेताजी महल में।
आजकल हर आंदोलन में एक नारा खूब सुनाई देला गद्दी छोड़ो, इस्तीफा दो! बाकि जवन सत्ता के शिखर पर बइठ गइल, ऊ एतना आसानी से गद्दी छोड़े वाला कहां होला? इतिहास गवाह बा कि राजसिंहासन पर बइठल लोग हमेशा अपना राज के बचावे आ बढ़ावे में लागल रहेला। कुर्सी छोड़ल आसान बात नइखे, चाहे व्यवस्था लोकतंत्र कहलावे या कुछ अउरी।
जंतर-मंतर होखे, सड़क होखे या चौराहा, लोग आवाज उठावेला। कई बेर लाठी खाला, गिरफ्तारी देला, धूप-पानी सहेला। एह सबसे लोकतंत्र के ताकत जरूर देखाई देला, बाकि सवाल ई बा कि का सिर्फ आवाज उठावे से सत्ता बदल जाला? अगर सत्ता जनता के पीड़ा ना सुने, त नारा लगावत-लगावत जनता थक जाला, बाकि सत्ता के चेहरा पर शिकन ना आवेला।
लोकतंत्र के असली ताकत चुनाव में होला, संविधान में होला, जनता के जागरूकता में होला। बाकि जब जनता के लागे कि ओकर बात सुनी ना जात बा, त ओकरे मन में ई सवाल उठेला कि का हमनी के सचमुच मालिक बानी, कि बस पांच साल पर एक दिन खातिर मालिक बनावल जानी?
राजा चाहे कवनो नाम से कहल जाव, अगर ओकरा लगे पूरा तंत्र, संसाधन आ ताकत बा, त ऊ तबे बदली जब जनता एकजुट होके संवैधानिक तरीका से अपना फैसला सुनाई। खाली…इस्तीफा दो के नारा लगावे से बदलाव मुश्किल बा। बदलाव तब आई जब जनता सवाल पूछी, जवाब मांगी, सही प्रतिनिधि चुनी आ लोकतांत्रिक अधिकारन के मजबूती से इस्तेमाल करी। याद राखीं, लोकतंत्र के जान जनता के जागरूकता में बा, ना कि खाली नाराबाजी में। लाठी खाए वाला कमजोर ना होला, ऊ लोकतंत्र के आवाज जरूर बनेला। बाकि सबसे बड़ा हथियार वोट, संविधान आ जनमत ह। अगर जनता एह ताकत के समझ ली, त सबसे मजबूत सिंहासन भी जनता के पैâसला से हिल सकेला।

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