-शंभू बॉर्डर सील, जंतर-मंतर से बीएचयू तक भड़का पेपर लीक विरोध
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
पेपर लीक, बेरोजगारी और प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर देश में उबल रहा असंतोष अब छात्र और किसान आंदोलनों के संगम में बदलता दिखाई दे रहा है। एक ओर किसानों को दिल्ली पहुंचने से रोकने के लिए पंजाब-हरियाणा के शंभू बॉर्डर पर कड़ी नाकेबंदी की गई है, तो दूसरी ओर कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के बैनर तले बड़ी संख्या में युवा मंगलवार को भी जंतर-मंतर पर डटे रहे।
बारिश के बावजूद प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, पेपर लीक मामलों की निष्पक्ष जांच और परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग पर अड़े रहे। सोमवार के ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इसके बाद ण्व्झ् ने कहा कि वह युवाओं को दोबारा पुलिस कार्रवाई के खतरे में डालने वाला मार्च नहीं निकालेगी, लेकिन जंतर-मंतर पर आंदोलन जारी रहेगा।
बीएचयू के विद्यार्थियों ने निकाला ‘न्याय मार्च’
वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भी पेपर लीक के विरोध और सोनम वांगचुक के समर्थन में हजारों विद्यार्थियों ने ‘न्याय मार्च’ निकाला। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच तीखी धक्का-मुक्की हुई। छात्र वाहनों और चौराहों पर चढ़कर तख्तियां लहराते तथा नारे लगाते दिखाई दिए। आंदोलनकारियों का दावा है कि झड़प में कई छात्र-छात्राओं और सुरक्षाकर्मियों को चोटें आर्इं। हालांकि, घायल लोगों की संख्या की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।
देशव्यापी हुआ आंदोलन
आंदोलन को सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और उनके समर्थन में देशभर में हो रहे प्रदर्शनों से भी बल मिला है। दिल्ली से उठी यह आवाज अब विश्वविद्यालयों और जिला मुख्यालयों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी कई स्थानों पर प्रदर्शन करते हुए केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्री के खिलाफ नारेबाजी की।
आंदोलन जारी रहेगा
छात्रों ने स्पष्ट कहा कि परीक्षा और भर्ती प्रणाली में पारदर्शिता लाए बिना आंदोलन समाप्त नहीं होगा। उनका कहना है कि बार-बार पेपर लीक और परीक्षाएं निरस्त होने से लाखों युवाओं का भविष्य अंधकार में जा रहा है। सीजेपी का आंदोलन अब केवल एक परीक्षा या मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहा बल्कि बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था और सरकारी जवाबदेही के बड़े सवालों से जुड़ गया है।
आंदोलनों की आग में सुलग रहा देश
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के ‘संसद चलो’ आंदोलन और पुलिस लाठीचार्ज ने भले ही देशभर का ध्यान खींचा हो, लेकिन इस समय भारत के अलग-अलग हिस्सों में कई बड़े आंदोलन चल रहे हैं। कहीं छात्र परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी के खिलाफ सड़कों पर हैं तो कहीं किसान, आदिवासी और पर्यावरण कार्यकर्ता अपनी जमीन, रोजगार और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए सरकार से टकरा रहे हैं।
सबसे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक टकराव दिल्ली में देखने को मिला। ण्व्झ् कार्यकर्ता कथित परीक्षा घोटालों के मुद्दे पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए संसद की ओर बढ़े। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। झड़पों में कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए और हिंसा से जुड़े कम से कम पांच मामले दर्ज किए गए। संगठन ने फिलहाल संसद मार्च स्थगित किया है, लेकिन जंतर-मंतर पर आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है।
उधर पंजाब और हरियाणा के हजारों किसान शंभू बॉर्डर पर जमा हुए हैं। किसान संगठनों ने प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का विरोध करते हुए दिल्ली में किसान महापंचायत बुलाने की तैयारी की है। उनका दावा है कि विदेशी कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खोलने से स्थानीय किसानों, दूध उत्पादकों और ग्रामीण रोजगार को भारी नुकसान होगा। हरियाणा पुलिस ने किसानों को राजधानी की ओर बढ़ने से रोकने के लिए बैरिकेडिंग और सुरक्षा बढ़ा दी है।
जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस देने की मांग भी फिर तेज हो गई है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्प्रâेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने दिल्ली में प्रदर्शन कर केंद्र सरकार पर अपना वादा पूरा नहीं करने का आरोप लगाया।
देशभर में आंदोलन
उत्तराखंड में ऋषिकेश राजमार्ग चौड़ीकरण के लिए ४,३६९ पेड़ काटने की योजना के खिलाफ स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आंदोलन सफल रहा। बढ़ते विरोध के बाद राज्य सरकार ने १८ जुलाई को पेड़ों की कटाई रोक दी और वैकल्पिक मार्ग पर विचार करने का आश्वासन दिया। देशभर में जारी ये आंदोलन अलग-अलग मुद्दों से जुड़े हैं, लेकिन इनमें एक समान संदेश है, रोजगार, शिक्षा, जमीन, पर्यावरण और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े पैâसले जनता से संवाद किए बिना लागू करना अब सरकारों के लिए आसान नहीं होगा।
