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संपादकीय : ये महाशय… संवाद क्यों नहीं साधते?

प्रधानमंत्री मोदी और शाह की जोड़ी ने कई पार्टियां तोड़ दीं। विधायक और सांसद खरीदकर अपना संख्या बल बढ़ा लिया, लेकिन जैसे ही उग्र युवाओं का हुजूम संसद की तरफ बढ़ा, मोदी डरकर संसद से निकल गए। वहीं गृहमंत्री शाह ने संसद के तमाम दरवाजों पर अंदर से ताले ठोक दिए और भड़के हुए युवाओं की तरफ पुलिसिया बंदूकें तान दीं। यह नजारा १२ सालों में भारत में पहली बार दिखा। आप इसे ‘जेन जी’ कहिए या कोई और विश्लेषण निकालिए, दिल्ली की सड़कों पर देश की आक्रोशित युवा शक्ति का जो लावा फूटा, उसे पूरी दुनिया ने देखा। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी भी ‘मेलोडी’ टॉफी चबाते हुए दिल्ली का यह मोदी-विरोधी गुस्सा देख रही होंगी। दुनिया और इंसानियत के लिए ‘मोदी’ एक बोझ बन चुके हैं और दुनिया ने ही भारत में मानवाधिकारों के हनन पर कई बार चिंता जताई है। आज फिर मोदी सरकार का वही क्रूर चेहरा सबके सामने आ गया। १३ से लेकर ३० साल तक के नौजवान आंदोलन में उतर पड़े थे और मोदी-शाह की पुलिस ने उनके सिर फोड़ डाले। मोदी-शाह के वश में होता, तो वे इन युवाओं का भी जलियांवाला बाग बना देते। मोदी ने बीते १२ सालों में पत्रकारों से कभी संवाद नहीं साधा। मोदी ने किसी भी आंदोलन के नेताओं से बात नहीं की। हिंदुओं के प्रमुख आस्था केंद्र ऋषिकेश में चार हजार पेड़ों के कत्ल के खिलाफ जनता का आंदोलन जारी है। हजारों लोग दिन-रात पेड़ों की हिफाजत कर रहे हैं। ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान मोदी ने शुरू किया था, जो कितना खोखला था, यह देशभर में हो रही अंधाधुंध कटाई से साफ नजर आता है। प्रिय मित्र गौतम अडानी के उद्योगों और खदानों के लिए झारखंड तथा छत्तीसगढ़ के जंगल तबाह किए जा रहे हैं। वहां भी लोग ‘जंगल बचाओ’ आंदोलन चला रहे हैं, लेकिन
मोदी चुप्पी साधे बैठे
हैं। महाराष्ट्र के अकोला (हिवरखेड़), सोलापुर (उजनी बांध), भंडारा (बावनथड़ी परियोजना), बुलढाणा (पेनटाकली) और जिगांव परियोजना जैसी जगहों पर परियोजना-पीड़ित किसान आंदोलन कर रहे हैं। नासिक में बिल्डरों के फायदे के लिए रिंग रोड के नाम पर किसानों के मकानों और जमीनों पर बुलडोजर चलाए जा रहे हैं। शक्तिपीठ मार्ग के लिए किसानों की उपजाऊ जमीनें जबरन छीनी जा रही हैं। इन किसानों से बात करने की हिम्मत न मोदी में है और न महाराष्ट्र के फडणवीस में। इसीलिए दिल्ली के आंदोलनकारियों की तर्ज पर अगर महाराष्ट्र के पीड़ित किसान मुंबई आकर मुख्यमंत्री के ‘वर्षा’ बंगले या राजभवन का घेराव कर दें तो इसमें कोई ताज्जुब नहीं होगा। राजनीति में संवाद बेहद अहम होता है, मगर मोदी सरकार और जनता के बीच का संवाद पूरी तरह खत्म हो चुका है। भाजपा के लिए मतदाता महज बिकने वाला सामान बन चुका है। ‘इस सामान को खरीदकर चुनाव जीते जा सकते हैं’, इसी फॉर्मूले पर १२ साल राज करने वाले मोदी के अहंकार को युवाओं के इस आक्रोश ने धूल में मिला दिया है। वैसे तो शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना आसान था, लेकिन मोदी इस्तीफा नहीं लेते; क्योंकि उसके बाद मंत्रिमंडल में इस्तीफों की लड़ी लग जाएगी। भ्रष्टाचार, लूटमार और नाकामी के पुतले बने कम से कम एक दर्जन मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ेगा। फिर हर बार जनता सड़कों पर उतरेगी और भ्रष्टों के इस्तीफे मांगने मोदी की चौखट पर दस्तक देगी। बांग्लादेश, लीबिया, नेपाल, दक्षिण कोरिया, ब्राजील और रोमानिया जैसे मुल्कों में नौजवान सड़कों पर उतरे और उन्होंने भ्रष्ट सरकारों को उखाड़ फेंका। भारत में भी इस उथल-पुथल का आगाज हो चुका है। लीबिया में २०११ के दौरान मुअम्मर गद्दाफी की हुकूमत के खिलाफ बहुत बड़ा जन-आंदोलन खड़ा हुआ था, जिसमें भारी तादाद में
युवाओं की भागीदारी
थी। शुरुआत में आंदोलन शांतिपूर्ण था, जो बाद में हिंसक टकराव और अराजकता में बदल गया। लोगों ने गद्दाफी को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ाकर मार डाला। भ्रष्ट और तानाशाह हुकूमतों का अंजाम ऐसा ही होता है। भारत में भी इसी जन-असंतोष की चिंगारी सुलग चुकी है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट से लेकर जिला व सत्र अदालतों तक पर भाजपा के लोगों ने कब्जा जमा रखा है। चुनाव आयोग पर मोदी-शाह के जी-हुजूर बैठे हुए हैं। वही तय करते हैं कि किसे वोट डालना है और किसे नहीं। सरकार किसकी बनेगी और विपक्षी दल की कमान कौन संभालेगा, इसका फैसला भी वही करते हैं। महाराष्ट्र विधानमंडल के दोनों सदनों में मुख्यमंत्री फडणवीस विपक्ष का नेता तक देने को तैयार नहीं हैं। यह एक तरह की तानाशाही ही है। मोदी सरकार बिना विपक्ष के देश चलाना चाहती है। हिटलर, मुसोलिनी और ईदी अमीन ने भी इसी ढर्रे पर हुकूमत चलाई थी, लेकिन जनता के प्रचंड विद्रोह में उनके साम्राज्य तबाह हो गए। दिल्ली का यह आंदोलन भारतीय हुक्मरानों के लिए खतरे की वही घंटी बजा रहा है। मोदी सरकार का पतन शुरू हो चुका है। दिल्ली की सड़कों पर पुलिस नौजवानों पर लाठियां बरसा रही थी और भड़के हुए युवा अपनी जगह अडिग रहकर खामोशी से लाठियां खा रहे थे। ‘मुझे और मारो, लेकिन मैं यहां से नहीं हटूंगा,’ ऐसा कहनेवाले आंदोलनकारी जहां खड़े हो जाएं, वहां तानाशाह उनका क्या बिगाड़ लेंगे? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की यह ठोकशाही सोमवार को दिल्ली की सड़कों पर दिखी। भारत की इस ‘बुद्ध’-भूमि पर सरकारी हिंसा इंसानियत को शर्मसार करने वाली साबित हुई। मोदी खुद को ‘विश्वगुरु’ कहलवाते हैं, अंधभक्त उन्हें भगवान विष्णु का तेरहवां अवतार मानते हैं, मगर वे दिल्ली की सड़कों पर बेकसूर युवाओं के सिर फोड़नेवाली शैतानी हुकूमत चला रहे हैं। सत्ता में बैठे हुक्मरानों ने अगर जनता से संवाद नहीं साधा तो उनका यह राजपाट ज्यादा दिनों तक टिकेगा ऐसा नहीं दिखता।

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